गोवर्धन झड़ापिया

रिपोर्ट | राजनीति

नरेंद्र मोदी के आलोचक रहे गोवर्धन झड़ापिया को उत्तर प्रदेश का जिम्मा मिलना क्या बताता है?

भाजपा ने आम चुनाव के मद्देनजर विभिन्न प्रदेशों के लिए प्रभारियों का ऐलान किया है. गोवर्धन झड़पिया को सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई है

ब्यूरो | 27 दिसंबर 2018 | फोटो: यूट्यूब

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बुधवार को भाजपा ने 2019 के आम चुनाव के लिए राज्य प्रभारियों के नाम का ऐलान किया. इसमें जिस नाम ने राजनीतिक विश्लेषकों को सबसे ज्यादा चौंकाया है वह है गोवर्धन झड़ापिया का. वे एक समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कठोर आलोचक रह चुके हैं. कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी अपने विरोधियों को माफ करते हैं और न भूलते हैं. तो सवाल उठता है कि इसके बावजूद गोवर्धन झड़ापिया को उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य की जिम्मेदारी कैसे मिल गई.

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देखा जाए तो गोवर्धन झड़ापिया ने अमित शाह की जगह ली है जो 2014 में उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे. तब भाजपा ने प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीती थीं. अब जब मोदी लहर का असर कम हो रहा है और वहां भाजपा के सामने सपा और बसपा के महागठबंधन से निपटने की बड़ी चुनौती है तो गोवर्धन झड़ापिया को राज्य की जिम्मेदारी मिलना कई सवाल उठाता है. मसलन क्या इसका मतलब यह है कि भाजपा नेतृत्व को ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कहने पर करना पड़ा. या फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने खुद ही यह जोखिम भरा दांव खेला है?

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आरएसएस के करीबी माने जाने वाले गोवर्धन झड़ापिया 2002 में हुए गुजरात दंगों के वक्त राज्य के गृहमंत्री थे. इस दौरान उनकी भूमिका पर भी सवाल उठे थे. दंगों के जांच के लिए बने आयोग ने तीन बार उनसे पूछताछ की थी. लेकिन फिर उन्हें क्लीनचिट दे दी गई. फिर भी इसके बाद न सिर्फ उनकी कुर्सी चली गई बल्कि वे पार्टी में भी हाशिए पर डाल दिए गए. 2009 में गोवर्धन झड़ापिया ने अपनी ‘महागुजरात जनता पार्टी’ बना ली और भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा. इसके बाद उन्होंने नरेंद्र मोदी के एक अन्य आलोचक केशुभाई पटेल से हाथ मिलाया और उनकी पार्टी में अपनी पार्टी का विलय कर दिया. पांच साल बाद 2014 में वे फिर से भाजपा में वापस आ गए. कहा जाता है कि ऐसा आरएसएस के कहने पर ही हुआ.

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झड़ापिया अब तक भाजपा की गुजरात इकाई तक ही सीमित थे. 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी ने उन्हें टिकट तक नहीं दिया था. अब वे सीधे उत्तर प्रदेश के प्रभारी हो गए हैं. राजनीतिक गुमनामी झेल रहे गोवर्धन झड़ापिया को अचानक इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलने के कई मतलब निकाले जा रहे हैं. जानकारों के मुताबिक झड़ापिया उस पाटीदार समुदाय से हैं जिसका काम मुख्य तौर पर खेती-किसानी है. पिछले कुछ समय में उन्होंने उत्तर प्रदेश में जाट और कुर्मी, राजस्थान में गुर्जर, ओडिशा में मोहांती और आंध्र प्रदेश में कपू जैसे खेती-बाड़ी से जुड़े समुदायों के बीच भी करीब से काम किया है. माना जा रहा है कि उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर भाजपा ने उस किसान समुदाय को बड़ा संदेश दिया है जो आजकल भाजपा से नाराज चल रहा है. गोवर्धन झड़ापिया की छवि कट्टर हिंदूवादी नेता की भी रही है. इसलिए कुछ का यह भी मानना है कि इसके जरिये भाजपा ने सपा-बसपा के महागठबंधन की चुनौती के खिलाफ कट्टर हिंदूवाद का कार्ड भी खेला है.

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गोवर्धन झड़ापिया के उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनने के औऱ मतलब भी निकाले जा रहे हैं. एक वर्ग के मुताबिक इसका अर्थ यह है कि आम चुनाव के लिहाज से सबसे अहम सूबे में अब आरएसएस की चल रही है. कुछ विश्लेषक इसे हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी हार के बाद मोदी-शाह के रवैये में आई नरमी का संकेत भी मान रहे हैं. उनके मुताबिक इस जोड़ी ने यह संकेत दिया है कि अब वह पार्टी के भीतर अपने विरोधियों के साथ भी मिलकर काम करने के लिए तैयार है.

(न्यूज 18 की इस रिपोर्ट पर आधारित)

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