रिपोर्ट | विदेश

अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी रणनीति क्यों बदलनी पड़ी है?

डेढ़ दशक से अफगानिस्तान में लड़ रहा अमेरिका अब छह महीने में ही तालिबान से सुलह करना चाहता है

ब्यूरो | 22 जनवरी 2019

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अफगानिस्तान में 17 साल से एक-दूसरे से लड़ रहे तालिबान और अमेरिका ने इस मसले को शांति से सुलझाने पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया है. बीते पांच महीनों में दोनों के बीच कई बार बैठक हुई है. बीते दिसंबर में दोनों के बीच संयुक्त अरब अमीरात में एक मैराथन बैठक हुई जिसमें पाकिस्तान और सऊदी अरब ने भी हिस्सा लिया. इन बैठकों को लेकर तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद का कहना था, ‘मैं अमेरिका के साथ चल रही शांति वार्ता के बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ भी नहीं कह सकता, लेकिन अब इतना साफ़ है कि अमेरिका हर हाल में इस मुद्दे को हमारे साथ सीधे बातचीत करके ही सुलझाना चाहता है…वह तो छह महीने में सुलह पर पहुंचना चाहता है, लेकिन हमें यह बहुत छोटी अवधि लगती है.’ इस बातचीत के चलते ही बीते महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान से अपने आधे सैनिकों को बुलाने का आदेश भी दे दिया.

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अमेरिका और तालिबान के बीच शुरू हुई बातचीत चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि अमेरिका हमेशा से यही कहता आ रहा था कि तालिबान एक आतंकी संगठन है और वह किसी आतंकी संगठन से सीधी बातचीत नहीं करेगा. उसका कहना था कि तालिबान को जो भी बातचीत करनी है अफगानिस्तान की सरकार से करे. उधर, तालिबान का कहना था कि वह किसी कठपुतली सरकार के साथ नहीं बल्कि अमेरिका से ही सीधी बात करेगा. इस सब के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि 17 साल से अफगानिस्तान में लड़ रहा अमेरिका अब मात्र छह महीने में सुलह क्यों चाहता है? आखिर, वह अब अचानक अपनी रणनीति क्यों बदल रहा है?

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इसकी पहली वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जो अगानिस्तान में अमेरिकी सेना की तैनाती के पक्ष में नहीं हैं. ट्रंप ने 2016 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का वादा भी किया था. तब उनका कहना था, ‘अफगानिस्तान में अमेरिकी फ़ौज के होने से 15 साल में कोई नतीजा नहीं निकल पाया है. सरकार को अमेरिकी करदाताओं का पैसा इस तरह बहाने की जरूरत नहीं है और अमेरिकी फौजों को तुरंत अफगानिस्तान से वापस बुलाया जाए.’ हालांकि राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप अपने इस वादे से पलटते दिखे. उनका कहना था, ‘सैन्य अधिकारियों का मानना है कि अभी अफगानिस्तान में अमेरिकी मिशन चलने दिया जाए, वहां और ज्यादा ताकत से लड़ने पर नतीजा जल्द आ सकता है.’ इसके साथ ही अमेरिका ने अफगानिस्तान में 3,000 और सैनिक भेजने की घोषणा कर दी थी.

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अमेरिकी जानकारों की मानें तो ऐसा इसलिए है कि अफगानिस्तान में डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति बुरी तरह असफल रही है. ट्रंप की आक्रामक नीति का अमेरिका को कोई फायदा नहीं हुआ, उलटे इसके बाद से तालिबान की ताकत में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी जरूर हुई है. बताते हैं कि इस आतंकी संगठन ने पिछले करीब एक साल में अफगान-अमेरिकी फौजों को शिकस्त देते हुए अपना कब्जा तेजी से बढ़ाया है. जहां कई देश अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा हिस्से पर तालिबान का कब्जा बताते हैं, वहीं पश्चिमी देशों की एजेंसियों ने भी माना है कि अब तालिबान का देश के 40 से 50 फीसदी हिस्से पर दावा मजबूत है. डोनाल्ड ट्रंप की नीति के बाद से युद्ध में मरने वालों की संख्या में भी रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई है.

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एक अमेरिकी थिंक टैंक के विशेषज्ञ बिल रोगजीओ एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘अमेरिका को अब शायद समझ में आ गया है कि तालिबान से नहीं लड़ा जा सकता क्योंकि तालिबान अनिश्चित समय के लिए लड़ने की सोच चुका है.’ वे आगे कहते हैं, ‘17 साल के युद्ध के बाद अमेरिका थक चुका है. अब वह वहां से निकलना चाहता है. एक वही है जो चाहता है कि शांति के लिए वार्ता की जाए. तालिबान तो अभी भी वार्ता करने को उतावला नहीं दिखता.’ ट्रंप के रुख में अचानक आए बदलाव की एक वजह और भी बताई जा रही है. इस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अफगानिस्तान एक ऐसी जगह है जहां अमेरिका सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर रहा है. बीते 17 साल में अमेरिका वहां 840 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम खर्च कर चुका है. अमेरिकी मीडिया की मानें तो बतौर राष्ट्रपति अमेरिका का पैसा बचाने में लगे डोनाल्ड ट्रंप अब अफगानिस्तान में एक भी डॉलर खर्च करने के मूड में नहीं हैं.

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