प्रकाश राज

विचार | राजनीति

निर्दलीय प्रत्याशियों के चुनाव जीतने की संभावना लगातार कम क्यों होती जा रही है?

जानकार मानते हैं कि निर्दलीय उम्मीदवारों का चुनाव में हिस्सा ना लेना या संसद तक न पहुंचना लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने वाला साबित हो सकता है

ब्यूरो | 08 जून 2019 | फोटो: ट्विटर/प्रकाश राज

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देश के संसदीय चुनावों और लोकसभा से जुड़े आंकड़ों को देखें तो एक बात साफ है कि निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए निचले सदन के दरवाजे अब करीब-करीब बंद हो चुके हैं. आजादी के बाद पहले आम चुनाव में 37 निर्दलीय उम्मीदवार जीत हासिल करने में सफल रहे थे. इसके बाद 1957 में 42 निर्दलीय उम्मीदवार लोकसभा में पहुंचे थे. लेकिन इसके बाद लोकसभा में निर्दलीय सांसदों की संख्या कम होने लगी. 1991 में केवल एक ही निर्दलीय संसद तक पहुंचने में कामयाब हो सका था. और 2014 में केवल तीन निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी.

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सवाल उठता है कि निर्दलीय प्रत्याशियों के जीतने की संभावना लगातार कम क्यों होती गई है? इसके कई कारण हैं. देश में हुए पहले लोकसभा चुनाव के वक्त लोकसभा में कुल सीटों की संख्या 489 हुआ करती थी. उस वक्त देश की कुल आबादी 36 करोड़ थी. 2019 में देश की जनसंख्या तो बढ़कर 130 करोड़ हो गई लेकिन लोकसभा की कुल सीटें केवल 543 ही हैं. इसका मतलब ये है आज हर उम्मीदवार को पहले से तीन गुना ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचना होता है. इसके लिए अधिक संसाधनों की जरूरत होती है. ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवारों के मुकाबले पार्टियों के उम्मीदवार बाजी मार ले जाते हैं.

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भारतीय संविधान के तहत देश में संसदीय प्रणाली पर आधारित शासन की व्यवस्था की गई है. इस प्रणाली में मतदाता अपने-अपने क्षेत्र में सांसद का चुनाव करते हैं जो बाद में प्रधानमंत्री को चुनते हैं. लेकिन जमीन पर देखें तो अक्सर पार्टियां या गठबंधन अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का ऐलान कर देते है. इसका एक उदाहरण नरेंद्र मोदी हैं. ऐसे में अक्सर मतदाता स्थानीय उम्मीदवार की जगह उस नेता के नाम पर वोट करते हैं. इस वजह से निर्दलीय उम्मीदवार इस दंगल से पूरी तरह बाहर ही हो जाते हैं.

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इसके अलावा एक बड़ा तबका ये भी मानता है कि ज्यादातर निर्दलीय प्रत्याशियों का इस्तेमाल किसी उम्मीदवार की जीत की संभावना को खत्म करने के लिए किया जाता है. उदाहरण के लिए, पिछले लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट पर भाजपा उम्मीदवार चंदू लाल साहू के नाम से मिलते-जुलते 10 निर्दलीय उम्मीदवार खड़े किए गए थे. इस बार केरल की वायनाड सीट पर कांग्रेसी प्रत्याशी राहुल गांधी के खिलाफ एक निर्दलीय उम्मीदवार राहुल गांधी भी खड़े थे जो जाहिर है कि इससे फैले भ्रम का फायदा खुद उठाने या किसी और को पहुंचाने के लिए खड़े होंगे.

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इन बातों के आधार पर ही विधि आयोग अपनी कई रिपोर्टों में निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक लगाने की सिफारिश कर चुका है. इसके अलावा संविधान की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय कमेटी ने भी साल 2002 में अपनी रिपोर्ट में निर्दलीय उम्मीदवारी को हतोत्साहित करने की सिफारिश की थी. लेकिन ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जो मानते हैं कि सिर्फ इस आधार पर इनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाना सही नहीं होगा. यदि ऐसा होता है तो यह चुनाव के लोकतांत्रिक ढांचे को भी कमजोर करने वाला साबित हो सकता है.

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