लालकृष्ण आडवाणी, भाजपा

विचार | राजनीति

वे कौन सी परिस्थितियां है जिनके होने पर लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बन सकते हैं

गुजरात के गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी का टिकट कटने के बाद उनकी सियासी पारी को खत्म बताया जा रहा है

ब्यूरो | 15 अप्रैल 2019 | फोटो: फेसबुक

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राजनीति के जानकार मानते हैं कि गुजरात के गांधीनगर से टिकट कटने के बाद भी लालकृष्ण आडवाणी का चुप होना असल में उनके ‘धैर्य’, ‘सब्र’ और ‘परिपक्वता’  की निशानी है. उनकी उम्र भले ही 91 वर्ष है लेकिन वे पूरी तरह से स्वस्थ है और अब भी वापसी कर सकते हैं. राजनीतिक हिसाब-किताब कुछ ऐसा है कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल लगातार इस कोशिश में हैं कि कुछ भी करके भाजपा की सौ सीटें कम कर दी जाएं. इसी समीकरण का फायदा आडवाणी जी को मिल सकता है.

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2019 के चुनावी नतीजों के बाद अगर किसी स्थिति में भाजपा की सीटों की संख्या 200 से नीचे चली जाती है तो फिर नरेंद्र मोदी के लिए दोबारा प्रधानमंत्री बनना आसान नहीं होगा. भाजपा ऊपर से भले ही एकदम सही दिख रही हो लेकिन इसके भीतर प्रमुख नेताओं में बहुत नाराजगी है जिसकी वजह पार्टी में मोदी-शाह का प्रभुत्व कायम होना है. संघ के कई नेता और सहयोगी दलों के मंत्री अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि वे इस नई भाजपा और इसकी सरकार की कार्यशैली से सहज नहीं है. भाजपा के मंत्रियों के साथ भी कुछ ऐसा ही है. जाहिर है मोदी-शाह से नाराज इस समूह को अगर यह जोड़ी कमजोर होती लगी तो वे इसे और कमजोर करने की कोशिश करेंगे.

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ऐसी स्थिति में मोदी के विकल्प के तौर पर भाजपा के अंदर और मीडिया में दो नाम चल रहे हैं. एक नाम है नितिन गडकरी का और दूसरा राजनाथ सिंह का. लेकिन भाजपा की आंतरिक राजनीति को समझें तो पता चलता है कि नितिन गडकरी के नाम पर नरेंद्र मोदी सहमत नहीं होंगे. अगर सीटें कम भी होती हैं तो भी नरेंद्र मोदी इतने कमजोर नहीं हो जाएंगे कि अगले प्रधानमंत्री के चयन में उनकी अनदेखी की जाए. ऐसी स्थिति में नरेंद्र मोदी की पसंद राजनाथ सिंह हो सकते हैं.

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राजनाथ सिंह की बात करें तो गृहमंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान वे यह समझ चुके हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर ‘रिमोट कंट्रोल’ से चलाने का काम नरेंद्र मोदी खुद करेंगे. भाजपा में राजनाथ सिंह को भी बेहद धैर्यवान माना जाता है. उनकी राजनीति को जो लोग समझते हैं, वे यह मानेंगे कि ऐसी स्थिति में वे इसके लिए काम करेंगे कि नरेंद्र मोदी और कमजोर हों और नेतृत्व नितिन गडकरी के हाथ में न चला जाए. राजनाथ सिंह का नाम आते ही नितिन गडकरी भी उन्हें रोकने की कोशिश करेंगे क्योंकि इन दो में से किसी एक को नेतृत्व मिला तो भविष्य की भाजपा का नेतृत्व कुछ सालों के लिए निश्चित हो जाएगा.

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ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी फिर से भाजपा की राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं. उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का मतलब यह होगा कि भाजपा में अगली पीढ़ी के नेतृत्व के लिए फिर से संघर्ष होगा और आडवाणी के रहते इसमें तीनों प्रमुख नेताओं – नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और नितिन गड़करी – को साल-दो साल का वक्त मिल जाएगा.जानकार मानते हैं कि संघ भी मोदी-शाह की शैली से छुटकारा चाहता है. साथ ही यह मानता है कि आडवाणी के रहते सांगठनिक सुधार की संभावनाएं ज्यादा हैं. इसके अलावा नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए आडवाणी का समर्थन करने कुछ वैसे क्षेत्रीय दल भी सामने आ सकते हैं, जो अभी कांग्रेस के साथ हैं.

सत्याग्रह की रिपोर्ट पर आधारित.

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