जस्टिस रंजन गोगोई

विचार | सुप्रीम कोर्ट

क्लीन चिट मिलने के बाद भी जस्टिस रंजन गोगोई उतने क्लीन क्यों नहीं दिख पा रहे हैं?

इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह है कि आंतरिक समिति की रिपोर्ट की एक कॉपी जस्टिस रंजन गोगोई को तो दी गई है लेकिन पीड़ित महिला को नहीं

ब्यूरो | 09 जून 2019 | फोटो: विकीपीडिया

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बीती 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों के घर एक पत्र पहुंचा. यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में बतौर जूनियर कोर्ट असिस्टेंट काम करने वाली एक महिला ने लिखा था. पहले यह महिला जस्टिस रंजन गोगोई की कोर्ट में कार्यरत थी लेकिन अक्टूबर 2018 में उसे उनके निवास पर बने कार्यालय में काम करने को कहा गया. पत्र में इस महिला ने जस्टिस गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. उसका कहना था कि कैसे जस्टिस गोगोई का विरोध करने के बाद उसका पूरा जीवन ही बदल गया. महिला का आरोप है कि इसके चलते न सिर्फ उसे नौकरी से निकाला गया बल्कि उसके पति और देवर को भी पुलिस की नौकरी से निलंबित कर दिया गया.

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पत्र मिलने के अगले दिन ही मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले की सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन कर दिया. ख़ुद आरोपित होने के बावजूद वे खुद भी इस पीठ का हिस्सा बन गए. जब इसका जमकर विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों ने मिलकर एक आंतरिक समिति के गठन का फैसला किया. जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता में बनी इस समिति में जस्टिस एनवी रमन्ना और जस्टिस इंदिरा बनर्जी भी शामिल थे. नियमानुसार इस तरह की समिति में महिलाओं की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए और समिति की अध्यक्षता किसी महिला को करनी चाहिए. बाद में जस्टिस रमन्ना की जगह इस समिति में जस्टिस इंदु मलहोत्रा को शामिल कर लिया गया लेकिन इसके अध्यक्ष जस्टिस बोबड़े ही बने रहे.

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समिति से जुड़े विवाद यही ख़त्म नहीं होते. समिति के सदस्य कभी इसे ‘औपचारिक आंतरिक समिति’ बताते रहे तो कभी अनौपचारिक जांच के गठित एक आम समिति. पीड़ित महिला का भी आरोप है कि सुनवाई के दौरान उसकी कई मांगों को ये कहते हुए नकार दिया कि ये कोई औपचारिक समिति नहीं है. लेकिन जब समिति ने अपनी रिपोर्ट बनाई तो उसे यह कहते हुए सार्वजनिक नहीं किया गया कि आंतरिक समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा सकती.

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समिति की सुनवाई के दौरान पीड़ित महिला ने मांग की थी कि उसे अपने वक़ील के ज़रिए अपनी बात रखने की अनुमति दी जाए. लेकिन समिति ने इसे नहीं माना. उसकी इन सुनवाइयों की वीडियो/ऑडिओ रिकॉर्डिंग करवाने की मांग भी ख़ारिज कर दी गई. यहां तक कि उसे उसके बयानों की प्रतिलिपि भी नहीं सौंपी गई. दो सुनवाइयों के बाद पीड़ित महिला ने इस समिति के सामने उपस्थित होने से ही इंकार कर दिया. इसके बाद पीड़ित महिला के बिना ही जांच को जारी रखा गया.

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इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि आंतरिक समिति की रिपोर्ट की एक प्रतिलिपि जस्टिस रंजन गोगोई को तो दी गई है लेकिन पीड़ित महिला को नहीं. ऐसे में कानून के कई जानकारों का मानना है कि अगर जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे आरोप ग़लत हैं भी तो भी जिस प्रक्रिया से उन्हें ग़लत घोषित किया गया है वह सही नहीं है.

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