एनडीए, बिहार, नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान

विचार | राजनीति

क्यों इस बार बिहार में एनडीए के लिए 2014 का प्रदर्शन दोहरा पाना मुश्किल हो सकता है?

इस बार जहां उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी ने एनडीए का साथ छोड़ा है, वहीं नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड गठबंधन में शामिल हो गई है

ब्यूरो | 07 जून 2019 | फोटो: ट्विटर-नरेंद्र मोदी

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बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बहुत अच्छी सफलता हासिल की थी. एनडीए को बिहार की 40 सीटों में से 31 पर जीत हासिल हुई थी. हालांकि, तब इसमें नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड शामिल नहीं थी.

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जब 2017 में नीतीश कुमार फिर एक बार एनडीए के पाले में आ गए तो लगा कि 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए की स्थिति 2014 से भी अधिक मजबूत हो जाएगी. हालांकि 2014 में एनडीए की घटक रही राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी अब उसमें नहीं है. इसके बावजूद नीतीश कुमार की वजह से भाजपा यह मानकर चल रही थी कि इस बार उसका प्रदर्शन पहले से भी अच्छा रहेगा.

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लेकिन बिहार में जमीनी स्तर से जो जानकारियां मिल रही हैं, उनसे ऐसा लग रहा है कि एनडीए के लिए इस बार पिछले लोकसभा चुनाव वाला प्रदर्शन दोहरा पाना भी मुश्किल हो सकता है. कहा जा रहा है कि किसी भी स्थिति में एनडीए के लिए इस बार 31 सीटें भी हासिल करना आसान नहीं होगा.

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इस स्थिति के लिए कई वजहें जिम्मेदार बताई जा रही हैं. पहली वजह तो यही है कि राष्ट्रीय जनता दल ने जो महागठबंधन बनाया है, उसमें जातिगत समीकरण एनडीए के मुकाबले ज्यादा अच्छे ढंग से साधे गये हैं. उदाहरण के तौर पर मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी को साथ लाकर महागठबंधन ने निषाद समाज को हर सीट पर अपने साथ करने में काफी हद तक कामयाबी हासिल की है.

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दूसरी वजह ये है कि रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी तो एनडीए के साथ है लेकिन पासवान समाज के बारे में ऐसा कहना मुश्किल है. बताया जाता है इस समाज के लोग रामविलास पासवान से इसलिए नाराज हैं कि जिन छह सीटों पर उनकी पार्टी चुनाव लड़ रही है, उनमें से तीन उन्होंने अपने परिजनों को ही दे दिए हैं. इसका नुकसान एनडीए को सिर्फ एलजेपी की सीटों पर ही नहीं बल्कि भाजपा और जेडीयू की सीटों पर भी हो सकता है.

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