विरल आचार्य, आरबीआई डिप्टी गवर्नर

विचार और रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

विरल आचार्य के इस्तीफे से आरबीआई की साख पर क्या असर पड़ने वाला है?

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपना कार्यकाल खत्म होने के छह महीने पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया है

ब्यूरो | 25 मई 2019 | फोटो: यूट्यूब

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भारत के आर्थिक जगत की चर्चाएं बजट पूर्व आकलनों में डूबी थीं कि खबर आई कि आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इसकी आशंका तभी पैदा हो गई थी जब पिछली मोदी सरकार और आरबीआई कुछ मुद्दों को लेकर आमने-सामने आ गए थे.

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उर्जित पटेल के नेतृत्व वाले रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक बैंकों के एनपीए पर सख्त रुख अपनाया था. उसने कई सरकारी बैंकों के कर्ज देने पर रोक लगा दी थी. सरकार और रिजर्व बैंक के बीच तकरार की एक और वजह यह भी थी कि सरकार केंद्रीय बैंक के सरप्लस से कम से कम 3.5 लाख करोड़ रुपया मांग रही थी. अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए वो रिजर्व बैंक की ब्याज दरों में कमी भी चाहती थी.

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उर्जित पटेल कम बोलने वाले व्यक्ति थे. लेकिन, उनके डिप्टी विरल आचार्य के एक भाषण ने सरकार को चौतरफा आलोचनाओं का शिकार बना दिया. इसमें विरल ने कहा था कि रिजर्व बैंक की स्वयत्तता पर हमला करने की कोशिश का परिणाम बहुत बुरा होता है. इसके कुछ दिन बाद आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफे के बाद रिटायर्ड आईएएस शक्तिकांत दास रिजर्व बैंक के गवर्नर बने. इसके बाद एक-एक कर उर्जित पटेल की नीतियों से किनारा कर लिया गया.

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नयी व्यवस्था में न केवल सार्वजनिक बैंकों के कर्ज बांटने पर लगी रोक हट गई बल्कि लगातार तीन बार ब्याज दरों में कटौती भी कर दी गई. जाहिर सी बात है यह विरल आचार्य को मंजूर नहीं था. शक्तिकांत दास और उनके डिप्टी विरल के बीच सबसे ताजा मतभेद राजकोषीय घाटे की गणना को लेकर था. विरल का मानना था कि इसके लिए सार्वजनिक उपक्रमों के कर्ज को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. लेकिन, शक्तिकांत दास इससे सहमत नहीं थे. जानकारों के मुताबिक, रिजर्व बैंक के मौजूदा प्रशासन में विरल आचार्य अकेले पड़ चुके थे और उन्हें अगला कार्यकाल विस्तार भी नहीं मिलने वाला था. ऐसे में चौंकाने वाली बात तब होती अगर वे इस्तीफा न देते.

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विरल आचार्य के इस्तीफे के बाद एक बार फिर से साख और स्वायत्तता से जुड़े सवाल आरबीआई का पीछा कर रहे हैं. लगातार दो अर्थशास्त्रियों के इस्तीफे के बाद आशंका जताई जा रही है कि कहीं पेशेवर लोग आरबीआई के ऊंचे पदों पर आने से कतराने न लगें. इससे पहले अरविंद पनगढ़िया और अरविंद सुब्रमण्यम जैसे अर्थशास्त्री भी बीच कार्यकाल में मोदी सरकार का साथ छोड़ चुके हैं.

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