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विचार और रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

आरबीआई की ब्याज दरों में लगातार कटौती से आर्थिक वृद्धि को कितना फायदा पहुंच सकता है?

हाल ही में आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने तीसरी बार कटौती से राहत की उम्मीद की जा रही थी लेकिन इसके बाद सेंसेक्स में आई गिरावट अलग ही बात कहती है

ब्यूरो | 08 मई 2019 | फोटो: फेसबुक

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छह जून को आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने लगातार तीसरी बार अपनी ब्याज दरों में चौथाई फीसदी की कटौती की. एमपीसी ने इससे बाजार को साफ संकेत दिया कि फिलहाल उसकी क्रेडिट पॉलिसी महंगाई के बजाय आर्थिक वृद्धि को मदद करने वाली ही रहेगी. आरबीआई की ब्याज दरों में लगातार तीसरी कटौती के बाद उसकी ब्याज दर नौ साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. लेकिन, क्या यह कटौती अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए पर्याप्त होगी?

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अर्थव्यवस्था के जानकारों में इस सवाल को लेकर मतभेद हैं. लेकिन, अगर संकेतों की बात की जाए तो आरबीआई की इस कटौती के बाद सेंसेक्स 550 अंक नीचे लुढ़क गया. जानकारों के अनुसार शेयर बाजार को लग रहा था कि ये कटौती दुगुनी होनी चाहिए थी. दरएसल सस्ते कर्ज और उसके सहारे आर्थिक वृद्धि की कोशिश में एक बहुत बड़ा पेंच है. आरबीआई तो रेपो रेट घटाकर बैंकों के लिए कर्ज सस्ते कर देता है, लेकिन इन सस्ते कर्जों का फायदा आम उपभोक्ता को नहीं मिल पाता है.

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जानकार मानते हैं कि रेट कट का फायदा अगर होगा भी तो सरकारी बैंको के ग्राहकों और नया कर्ज लेने वालों को ही होगा. यानी कि कर्ज की दर इतनी कम होगी नहीं कि लोग इसके प्रति ज्यादा आकर्षित हों. और पुराने कर्जदारों का इसकी वजह से कोई धन नहीं बचने वाला. ऐसे में आरबीआई की इस कटौती से अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद लगाना सही नहीं लगता है.

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लगातार घटती ब्याज दरों का एक पक्ष और भी है. कर्ज सस्ते होने के कारण बैंक अपनी जमा योजनाओं पर देने वाले ब्याज को भी घटा सकते हैं. यानी इससे कर्ज की ईएमआई में कमी हो न हो बैंक में जमा धन पर मिलने वाले ब्याज में कमी जरूर हो सकती है. आम उपभोक्ताओं के लिए यह बिना दिये या एक हाथ से देकर और दूसरे हाथ से ले लेने वाली बात है.

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ऐसी स्थिति में बैंकों की भी मुसीबत बढ़ सकती है. वे पहले से ही नगदी के भयानक संकट से जूझ रहे हैं और अगर उन्होंने जमा योजनाओं की ब्याज दरें घटाईं तो ग्राहक उनसे छिटक सकता है. इसे आर्थिक वृद्धि के लिहाज से अच्छा नहीं माना जा सकता जो पहले ही पिछले पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है.

  • शक्तिकांत दास

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