शक्तिकांत दास

विचार और रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

आरबीआई द्वारा सरकार को 1.76 लाख करोड़ रु दिए जाने का गणित क्या है?

कुछ समय पहले जालान कमेटी ने सिफारिश की थी कि आरबीआई का इस साल के शुद्ध लाभ को सरकार को स्थानांतरित कर दिया जाए

ब्यूरो | 29 अगस्त 2019 | फोटो: पीआईबी

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आखिरकार आरबीआई ने अपने आरक्षित कोष से सरकार को 1.76 लाख करोड़ से ज्यादा की रकम देने के फैसले पर मुहर लगा दी. इसे लेकर राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला भी शुरु हो चुका है. अगर विपक्ष के आरोपों को छोड़ भी दें तो भी यह सवाल अपनी जगह है कि सरकार को इतनी मोटी रकम देने से क्या एक केंद्रीय बैंक के तौर पर आरबीआई कमजोर होगा?

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रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष के मुख्यतः तीन हिस्से हैं. पहला हिस्सा है – करेंसी एंड गोल्ड रिवैल्यूएशन एकाउंट यानी सीजीआरए फंड. यह आरबीआई के आरक्षित कोष का सबसे बड़ा हिस्सा होता है. पिछले वित्त वर्ष में सीजीआरए फंड में लगभग 6.91 लाख करोड़ रूपये थे. इसके बाद आरबीआई का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण फंड है – कंटिंजेंसी फंड. इस कोष में पिछले साल आरबीआई के पास 2.32 लाख करोड़ रूपये थे. इसके अलावा अपने एसेट डेवलपमेंट फंड (एडीएफ) में भी आरबीआई एक निश्चित मात्रा में रकम रखता है. लेकिन, यह बाकी दो फंडों के मुकाबले छोटा होता है.

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सरकार और रिजर्व बैंक के बीच आरक्षित कोष को लेकर हुए विवाद को हल करने के लिए बिमल जालान कमेटी का गठन किया गया था. जालान कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आरबीआई को सीजीआरए के तहत इतना फंड रखना चाहिए कि वह उसकी कुल संपत्ति का 20 से 24.5 फीसद हो. जून 2019 तक आरबीआई के सीजीआरए में जो रकम मौजूद थी, वह बैलेंसशीट की 23.3 फीसद थी. ऐसे में कमेटी का मानना था कि आरबीआई का इस साल का शुद्ध लाभ जो 1.23 लाख करोड़ से ज्यादा है, उसे सरकार को स्थानांतरित कर दिया जाए.

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इसके अलावा कंटिंजेंसी फंड के बारे में जालान कमेटी ने कहा कि आरबीआई को अपनी आकस्मिक जरूरतों से निपटने के लिए उसमें इतनी रकम रखनी चाहिए जो बैलेंस शीट के 5.5 से 6.5 फीसद के बीच हो. इस समय यह रकम 6.8 फीसदी है. जालान कमेटी ने अपनी सिफारिश में ये भी कहा था कि मौजूदा साल में आरबीआई को इस फंड के लिए न्यूनतम सीमा को मानना चाहिए. आरबीआई बोर्ड ने कमेटी की इस सिफारिश को मानते हुए अपनी आकस्मिक निधि से 52,637 करोड़ रूपये सरकार को देने का फैसला किया है. अगर इसे आरबीआई के शुद्ध लाभ से जोड़ दें तो सरकार को मिलने वाली कुल रकम पौने दो लाख करोड़ से ज्यादा हो जाती है.

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जानकारों का मानना है कि आरक्षित कोष आरबीआई की सबसे बड़ी ताकत है. ऐसे में उनका कहना है कि जालान कमेटी की सिफारिशों को मानने से आरबीआई की आपात आर्थिक हालातों से निपटने के क्षमता पहले से कम हुई है. इनका मानना है कि कम से कम शुरुआत में आरबीआई को बिमल जालान कमेटी की सिफारिशों को इस तरह माना जाना चाहिए था कि कम से कम धन सरकार को दिया जाता. यानी सीजीआरए को बैलेंस शीट का 24.5 फीसदी और कंटिंजेंसी फंड को 5.5 फीसदी रखा जाता. इसके उलट आर्थिक जानकारों का एक खेमा मानता है कि आरबीआई का आरक्षित कोष सरकार की नीतियों से भी प्रभावित होता है. इसलिए इसे इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. फिलहाल मंदी की चुनौतियों से जूझ रही सरकार के लिए यह रकम बहुत मददगार साबित होने वाली है.

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