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विचार और रिपोर्ट | राजनीति

क्यों गरीब सवर्णों को सही मायने में आरक्षण मिलना मुश्किल नहीं, नामुमकिन है

मोदी सरकार ने आठ लाख रुपये से कम सालाना आमदनी वाले अगड़ी जातियों के लोगों को भी शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का फैसला किया है

ब्यूरो | 08 जनवरी 2019 | फोटो: फेसबुक/आईआईटी कानपुर

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सवर्णों को शिक्षा और सरकारी नोकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. है. मोदी सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक आठ लाख रुपये से कम सालाना आमदनी वाले अगड़ी जातियों के लोगों को आरक्षण का लाभ मिल पाएगा. यह पहले से आरक्षण के लिए तय अधिकतम 50 फीसदी की सीमा के अतिरिक्त होगा. यही वजह है कि इसे लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा. इसके लिए मोदी सरकार ने लोकसभा में विधेयक पेश कर दिया है.

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मोदी सरकार के इस फैसले की व्याख्या अलगअलग ढंग से हो रही है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की ओर से कहा जा रहा है कि यह सरकार अगड़ी जातियों के गरीबों के कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध है. वहीं विपक्ष और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक केंद्र सरकार के इस फैसले को 2019 लोकसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं. सरकार के इस फैसले का आलोचना करते हुए ये लोग जो कह रहे हैं, उसका सार यह है कि मोदी सरकार के लिए इस आरक्षण को लागू करना असंभव जैसा है.

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आम तौर पर कैबिनेट की बैठक बुधवार को होती है. लेकिन यह निर्णय सोमवार को बैठक बुलाकर लिया गया. वह भी तब जब मंगलवार को संसद के शीतकालीन सत्र का आखिरी दिन था. ऊपर से मोदी सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत भी नहीं है. इसलिए इस आरक्षण को लागू करने के लिए जरूरी संविधान संशोधन का संसद में पारित होना मुश्किल लग रहा है.

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इस आरक्षण के रास्ते की एक और बड़ी अड़चन न्यायपालिका है. पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि आरक्षण 50 फीसदी की सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए. ऐसे में माना यह जा रहा है कि अगर संसद से इस आरक्षण को स्वीकृति मिल भी जाए तो भी न्यायपालिका से इसे मंजूरी मिलना संभव नहीं है. और अगर यह भी हो गया तो इसके दायरे में इतने लोग आ जाएंगे कि इसका होना-न होना एक जैसा हो सकता है. 

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कहा जा रहा है कि हालिया विधानसभा चुनावों में अगड़ी जातियों के गुस्से की शिकार हुई भाजपा ने उन्हें अपने पाले में वापस लाने के लिए यह दांव चला है. अगड़ी जातियां संसद द्वारा सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को पलटने की वजह से मोदी सरकार से नाराज बताई जा रही हैं. इस फैसले में शीर्ष अदालत ने एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने पर फौरन गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी.

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