तिरंगा, भारतीय मुद्रा

विचार और रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

आरबीआई के बाद सेबी के सरप्लस का मामला भी एक नए विवाद की वजह क्यों बनता जा रहा है?

सरकार ने इस बार के आम बजट में प्रावधान किया है कि सेबी को अपने सरप्लस का 75 फीसदी हिस्सा हर साल उसे देना होगा

ब्यूरो | 25 जुलाई 2019

1

आरबीआई के सरप्लस को लेकर सरकार और केंद्रीय बैंक में चले लंबे झगड़े के बाद बनी विमल जालान कमेटी ने अपना काम पूरा कर लिया है. अभी यह साफ नहीं हुआ है कि आरबीआई रिजर्व से भारत सरकार को कितने पैसे मिलेंगे. लेकिन यह हो पाए उससे पहले ऐसा ही एक और विवाद चर्चा में है. यह विवाद बाजार नियामक संस्था सेबी से जुड़ा है.

2

सरकार ने इस बार के आम बजट में प्रावधान किया है कि सेबी को अपने सरप्लस का 75 फीसदी हिस्सा हर साल उसे देना होगा. इसके अलावा अपने सालाना खर्चों के लिए भी अब सेबी को सरकार की अनुमति लेनी पड़ेगी. इसने विवाद की शक्ल लेना तब शुरु किया, जब इस प्रस्ताव से नाखुशी जताते हुए सेबी कर्मचारियों ने सरकार को चिट्ठी लिखी. सेबी प्रमुख अजय त्यागी ने भी सरकार को इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार के लिए पत्र लिखा है. लेकिन केंद्र सरकार ने सेबी कर्मचारियों की इस मांग को अस्वीकार कर दिया है.

3

सेबी के पास पैसे आने के मोटे तौर पर दो तरीके होते हैं. पहला, बाजार का रेग्यूलेटर होने के नाते वह किसी भी प्रकार की अनियमितता पर जुर्माना लगाती है. दूसरा, सेबी में रजिस्ट्रेशन कराने और अन्य कई तरह के शुल्कों से उसे पैसा मिलता है. जुर्माना या किसी सेटेलमेंट का पैसा सेबी सरकार को दे देती है. बाकी उसके जनरल फंड में रहता है जिससे सेबी का खर्च चलता है.

4

आर्थिक जानकार यह मानते हैं कि सेबी का काम धन कमाना नहीं है. लेकिन नई व्यवस्था से यह समझ बन सकती है कि इससे भी सरकार का राजस्व बढ़ाया जा सकता है. यह बाजार के लिए अच्छी बात नहीं होगी. इसके अलावा बाजार की देख-रेख के लिए सेबी को सूचना तकनीक में लगातार मोटा निवेश करते रहना पड़ता है. नया प्रस्ताव लागू होने के बाद ऐसा करना आसान नहीं रह जाएगा.

5

माना जा रहा है कि सरकार के इस नये प्रस्ताव का आधार कैग की एक रिपोर्ट है. इसमें कहा गया था कि सेबी और इरडा जैसी नियामक संस्थाओं के सरप्लस को भी भारत सरकार की संचित निधि का हिस्सा होना चाहिए. जानकारों का मानना है कि कैग का यह सुझाव उसकी ऑडिटिंग की चिंताओं से जुड़ा हुआ था जिनके हल दूसरे तरीकों से निकाले जा सकते हैं. लेकिन सेबी जैसी संस्था का स्वायत्त और चुस्त बने रहना भी उतना ही जरूरी है. क्योंकि ऐसा न होने का असर पूरे भारतीय बाजार पर पड़ना तय है.

  • शाओमी रेडमी के-20 प्रो

    खरा-खोटा | मोबाइल फोन

    शाओमी रेडमी के20 प्रो: एक ऐसा स्मार्टफोन जिसकी डिजाइन और कीमत सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं

    ब्यूरो | 08 सितंबर 2019

    ह्वावे लोगो

    विचार और रिपोर्ट | तकनीक

    अमेरिका की नीतियों से जूझ रहे ह्वावे को क्या उसका नया ऑपरेटिंग सिस्टम राहत दे सकता है?

    ब्यूरो | 05 सितंबर 2019

    महबूबा मुफ्ती

    समाचार | बुलेटिन

    महबूबा मुफ्ती की बेटी को उनसे मिलने की इजाजत दिए जाने सहित आज के बड़े समाचार

    ब्यूरो | 05 सितंबर 2019

    भारतीय उच्चायोग

    समाचार | बुलेटिन

    कश्मीर को लेकर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग पर पथराव होने सहित आज के बड़े समाचार

    ब्यूरो | 04 सितंबर 2019