बोगीबील पुल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

विचार और रिपोर्ट | राजनीति

कैसे ‘मोदी नहीं तो और कौन?’ का सबसे बढ़िया जवाब भारतीय राजनीति का इतिहास देता है

लाल बहादुर शास्त्री से लेकर मनमोहन सिंह तक का इतिहास बताता है कि भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे चेहरे प्रधानमंत्री बने हैं जिनके बनने की उम्मीद किसी को नहीं थी

ब्यूरो | 08 जून 2019 | फोटो: पीआईबी

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तकरीबन 17 साल तक प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू मृत्यु के बाद उनकी खाली जगह को भरने के लिए किसी कद्दावर नेता की जरूरत थी. उस वक्त प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई थे, जिन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा का भी समर्थन प्राप्त था. लेकिन कांग्रेस का एक धड़ा मोरारजी की व्यक्तिगत दक्षिणपंथी झुकाव वाली राजनीति को पसंद नहीं करता था. इसलिए लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम आगे किया गया. ऐसा करने वालों का विचार था वे भोले-भाले शास्त्रीजी पर हावी रह पाएंगे और सरकार उनके नियंत्रण में होगी. लेकिन शास्त्रीजी ने सभी कयासों को धता बताकर खुद की विवेकशील निर्णय क्षमता के चलते लगभग दो साल तक मजबूत सरकार चलाई.

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लालबहादुर शास्त्री की असामायिक मृत्यु के बाद एक बार फिर मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएं थीं. लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि शास्त्रीजी के कैबिनेट में शांत और शर्मीले स्वभाव की मंत्री मालूम होने वाली इंदिरा न सिर्फ देर-सवेर विकल्प के तौर पर उभरेंगी बल्कि प्रधानमंत्री भी बनेंगी और आगे चलकर सभी कार्यकाल मिलाकर लगभग 16 सालों तक इस देश के सर्वोच्च पद को संभालेंगी. ‘गूंगी गुड़िया’ कहलाए जाने से शुरू हुआ इंदिरा गांधी का यह सफर ‘आयरन लेडी’ और ‘दुर्गा’ जैसे सम्मानित नामों तक पहुंचा था.

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1975 में इमरजेंसी लगाने के बाद इंदिरा गांधी को लगा कि वे 1977 का चुनाव भी आसानी से जीत जाएंगीं. उनके ज्यादातर विरोधी जेल में थे, देश की ज्यादातर संवैधानिक संस्थाएं उनकी जेब में थीं, और उन्हें ये भ्रम था कि जनता उनके साथ है. लेकिन 1977 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी बुरी तरह हारीं और जिन मोरारजी देसाई को कांग्रेस ने दो बार प्रधानमंत्री बनने से वंचित रखा, वे जनता पार्टी के उम्मीदवार बनकर दो साल के लिए देश के प्रधानमंत्री बने. चुनावों से पहले मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने का किसी ने सोचा तक नहीं था और ‘इंदिरा कल्ट’ ऐसा था कि कहा जाने लगा था कि ‘इंदिरा गांधी का कोई विकल्प नहीं है’.

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1991 का चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस की तरफ से मुख्य दो दावेदारों में शरद पवार और अर्जुन सिंह के ही नाम शामिल थे. लेकिन पीवी नरसिम्हा राव हिंदुस्तान के नौंवे प्रधानमंत्री बने. चाणक्य कहे जाने वाले राव ने अगले पांच साल ‘मजबूत’ सरकार भी चलाई और अपने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह की मदद से हिंदुस्तानी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोलकर कई जानकारों के मुताबिक देश का सही-सच्चा ‘विकास’ किया. कई सारे गलत राजनीतिक फैसले लेने के बावजूद इसीलिए नरसिम्हा राव को हिंदुस्तान के सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्रियों में गिना जाता है.

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एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और मनमोहन सिंह को भी नहीं भूला जाना चाहिए. ये तीनों राज्यसभा सदस्य थे और बिना लोकसभा चुनावों में ‘चेहरा’ बने अकस्मात ही देश के प्रधानमंत्री बने थे. इनके कार्यकाल में विवादों और असफलताओं की कमी नहीं रही और मनमोहन सिंह को छोड़कर बाकी दोनों ने पांच वर्ष का कार्यकाल भी पूरा नहीं किया. लेकिन इन तीनों का प्रधानमंत्री बनना तीन और ऐसे उदाहरण देता है जो बताते हैं कि भारतीय राजनीति देश के सर्वोच्च पद का चुनाव करते वक्त कभी विकल्पहीन नहीं रही.

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