नरेंद्र मोदी और अमित शाह

विचार और रिपोर्ट | राजनीति

क्यों कल आने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे एग्जिट पोलों से अलग भी जा सकते हैं

ज्यादातर एग्जिट पोल 23 मई को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार की वापसी की बात कहते हैं

ब्यूरो | 22 जून 2019 | फोटो: तरुण चुग-ट्विटर

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बीते रविवार को लोकसभा चुनाव का आखिरी चरण निपट गया. इसके तुरंत बाद आए एग्जिट पोलों में से ज्यादातर एनडीए को बहुमत मिलता दिखा रहे हैं. भाजपा का कहना है कि इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में जारी जनसमर्थन की पुष्टि होती है. उधर, कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने एग्जिट पोल के इन नतीजों को खारिज कर दिया है.

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एग्जिट पोल के तहत उन लोगों से बात की जाती है जो वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकले हों. उनसे कई सवाल पूछे जाते हैं जिनमें सबसे अहम होता है कि उन्होंने अपना वोट किसे दिया. एक निश्चित संख्या, जैसे सैंपल साइज कहा जाता है, में वोटरों से बात करके फिर उसका विश्लेषण किया जाता है और अंदाजा लगाया जाता है कि कितने फीसदी वोट किस पार्टी को जा रहे हैं. फिर भी ये गलत हो जाते हैं.

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2004 का आम चुनाव इसका उदाहरण है. तब हुए तमाम एग्जिट पोल एनडीए को जीता बता रहे थे. साल 2009 में एक्जिट पोल्स यूपीए को सिर्फ 196 सीटें मिलती दिखा रहे थे. लेकिन नतीजे आए तो उसे 262 सीटें मिली थीं. ऐसा दुनिया में और भी कई जगहों पर हुआ है. ताजा उदाहरण ऑस्ट्रेलियाई चुनावों का ही है. यहां चुनावों के बाद 56 अलग-अलग एजेंसियों ने एग्जिट पोल किए थे, लेकिन ये सभी गलत साबित हुए. ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के मसले पर भी एग्जिट पोल गलत साबित हुए थे. और अमेरिका में पिछले राष्ट्रपति चुनाव में वे हिलेरी क्लिंटन को जीतता दिखा रहे थे. लेकिन जीते डोनाल्ड ट्रंप.

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भारत जैसे जटिल समाज में एग्जिट पोल करने वालों की चुनौती और भी बड़ी होती है. यहां सामाजिक और राजनीतिक ताकत के बंटवारे में बहुत गैरबराबरी है. इसके चलते ज्यादातर लोग किसी अनजान व्यक्ति को अपने वोट के बारे में बताने से कतराते हैं या फिर वे अक्सर खुद को आम चलन के साथ जाता दिखाते हैं.

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कई बार ऐसा भी हो सकता है कि किसी उम्मीदवार को अपने करीबी प्रतिद्वंदी से ज्यादा वोट पड़े हों, लेकिन एग्जिट पोल में हिस्सा लेने वाले लोग उसके समर्थक न हों. माना जाता है कि अमेरिका में 2004 के राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा ही हुआ था. तब एग्जिट पोल जॉन कैरी के जीतने की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन बाजी हाथ लगी जॉर्ज बुश के. कुछ जानकारों का ये भी मानना है कि पहले के उलट अब ज्यादातर सर्वेक्षण या तो काफी हल्के-फुल्के तरीके से किये जाते हैं या फिर प्रायोजित होते हैं.

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