तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव

विचार और रिपोर्ट | राजनीति

क्या लालू यादव का परिवार टूट के मुहाने पर है?

जब लालू यादव के बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप यादव राजनीति में आये थे तब यह तय हुआ था कि वे दोनों प्रदेश की सियासत करेंगे और मीसा भारती दिल्ली की

ब्यूरो | 09 दिसंबर 2018 | फोटो: rjd.co.in

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लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव अब अपने तरीके से जीवन जीना चाहते हैं और छोटे भाई तेजस्वी यादव के साये में रहना उन्हें पसंद नहीं. राष्ट्रीय जनता दल की खबर रखने वाले एक सूत्र बताते हैं कि परिवार में अकेले पड़े तेज प्रताप को अपनी बड़ी बहन और राज्यसभा सांसद मीसा भारती का भी समर्थन है.

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लालू यादव के परिवार में राबड़ी देवी के बाद सबसे पहले सियासत में बड़ी बेटी मीसा भारती ही कूदी थी. लालू यादव ने जब अपने दोनों बेटों को विधानसभा चुनाव लड़ाया उस वक्त यह तय हुआ था कि तेजस्वी और तेज प्रताप यादव प्रदेश की सियासत करेंगे और मीसा भारती दिल्ली की. यह कुछ वैसा ही था जैसे तमिलनाडु में भाई स्टालिन राज्य की राजनीति संभालते हैं और बहन कनिमोझी दिल्ली और चेन्नई के बीच सूत्र का काम करती हैं.

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लालू यादव के जेल जाने के बाद से मीसा भारती लगातार पार्टी और परिवार में कमजोर पड़ती जा रही हैं. उनकी जायदाद पर छापे पड़े, उनसे और उनके पति से घंटों पूछताछ हुई, लेकिन तेजस्वी ने इसके विरोध में कुछ बड़ा नहीं किया. और अब दिल्ली में भी मीसा को तवज्जो नहीं दी जाती है. राहुल गांधी से सीधे तेजस्वी की ही बातचीत होती है. तेजस्वी की अपनी एक अलग टीम भी है जो लालू यादव की टीम से एकदम अलग है. दिल्ली में उनका मीडिया मैनेजमेंट राज्यसभा सांसद मनोज झा देखते हैं.

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राजद के एक बड़े नेता बताते हैं कि तेजस्वी यादव अब लालू स्टाइल सियासत से आगे बढ़कर नई सोच वाले लोगों की टीम बना चुके हैं. तेज प्रताप यादव का घर आना, मीसा भारती का नाराज़ हो जाना, कभीकभी मां राबड़ी का गुस्सा हो जाना, इस नई टीम को मिली ताकत की वजह से ही है. इसीलिए लालू के पुराने वफादार नेताओं की मंडली अब मीसा भारती और तेज प्रताप यादव के इर्दगिर्द जुटने लगी है.

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भाजपा यह मानती है कि आने वाले चुनाव में ज्यादातर यादव वोट एनडीए को नहीं मिलेंगे. मुसलमान वोट मिलने की उम्मीद भी बेहद कम है. बिहार एक ऐसा राज्य है जहां यादव और मुसलमान वोट जोड़ दें तो यह आंकड़ा 25 से 30 फीसदी के करीब पहुंच जाता है. ऐसे में अगर लालू परिवार में ही दो गुट बन जाएं, तो उनके विरोधियों के लिए चुनाव आसान हो सकता है.

सत्याग्रह की रिपोर्ट पर आधारित

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