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विचार और रिपोर्ट | विदेश

अनुच्छेद-370 को लेकर भारत के फैसले पर इस्लामिक देश चुप क्यों हैं?

पाकिस्तान की कई अपीलों के बाद भी मुस्लिम देशों ने कश्मीर पर भारत के हालिया फैसले की आलोचना नहीं की है

ब्यूरो | 18 अगस्त 2019 | फोटो : पीआईबी

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बीते हफ्ते भारत ने जम्मू-कश्मीर से धारा-370 को हटा दिया. इसके विरोध में पाकिस्तान ने बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी. उसने भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित कर दिया, द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया और दोनों देशों के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस को भी हमेशा के लिए बंद कर दिया. पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह इस मुद्दे को सभी महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर उठाएगा और भारत पर अपने निर्णय को वापस लेने का दबाव बनाएगा.

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बीते एक हफ्ते में पाकिस्तान ने इस मामले को कई जगह उठाया भी. लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने इस पर ज्यादा कुछ न बोलते हुए सिर्फ दोनों देशों से शांति बनाए रखने की अपील की. वहां से निराशा मिलने के बाद पाकिस्तान को सबसे ज्यादा उम्मीद अपने सहयोगी मुस्लिम देशों से थी. लेकिन इस्लामिक सहयोग संगठन (आईओसी) और तमाम मुस्लिम देशों – यूएई, सऊदी अरब, ईरान, मलेशिया और तुर्की – ने इस मसले पर जो प्रतिक्रिया दी है उससे पाकिस्तान को बड़ा झटका लगा है. उन्होंने भारत-पाकिस्तान से कश्मीर मुद्दे को द्विपक्षीय बातचीत के जरिए सुलझाने का सुझाव दिया. यूएई ने तो कश्मीर को भारत का आंतरिक मुद्दा तक बता दिया.

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विदेश मामलों के कुछ जानकार इसकी वजह मध्यपूर्व के देशों के भारत के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्तों को बताते हैं. इनके मुताबिक भारत सऊदी अरब, क़तर, ईरान और यूएई के सबसे बड़े तेल और गैस के खरीदारों में आता है और पिछले कुछ सालों में इन सभी देशों के साथ उसने कई बड़े व्यापारिक समझौते भी किये हैं. भारत इन देशों में बड़ा निवेश कर रहा है और इन देशों की कंपनियां भी भारत में ऐसा ही कर रही हैं. हाल ही में ही सऊदी अरब की प्रमुख तेल कंपनी अरामको ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के तेल और पेट्रोरसायन कारोबार में एक लाख करोड़ से ज्यादा रुपए के निवेश का ऐलान किया है.

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पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक हुसैन हक्कानी के मुताबिक अरब देश भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को दिन पर दिन मजबूत बनाना चाहते हैं. उन्हें पता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार में कमी आने के बावजूद वह 6.5-7 फीसदी की दर से चल रही है और उसका आकार भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का नौ गुना है. दूसरी तरफ पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसकी विकास दर 3.5 फीसदी से भी कम है. कुछ जानकार कहते हैं कि भारत जहां अरब देशों में निवेश की बात करता है वहीँ पाकिस्तान केवल कर्ज लेने के लिए वहां का रुख करता है.

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जानकार कश्मीर मसले पर मुस्लिम देशों की चुप्पी के पीछे का एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इन देशों से बनाये गये नए स्तर के राजनयिक संबंधों को भी मानते हैं. इजरायल से बेहतर संबंधों की परवाह न करते हुए न केवल उन्होंने फलस्तीन, जॉर्डन और ओमान का दौरा किया बल्कि संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के खिलाफ लाये गए प्रस्तावों पर भी खुद को तटस्थ रखा. ऐसे में मुस्लिम देशों की भारत को लेकर सोच बदली है. उन्हें यह अहसास हुआ है कि भारत से भी उनके बेहद करीबी रिश्ते हो सकते हैं, और उन्हें केवल पाकिस्तान के चश्मे से ही नहीं देखा जाना चाहिए.

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