डोनाल्ड ट्रंप

विचार और रिपोर्ट | विदेश

आईएनएफ संधि के टूटने से भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

अमेरिका ने 32 साल पहले रूस के साथ हुई ‘मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि’ यानी आईएनएफ से खुद को अलग कर लिया है

ब्यूरो | 08 अगस्त 2019 | फोटो: फेसबुक-डोनाल्ड ट्रंप

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बीते शुक्रवार को अमेरिका ने रूस के साथ हुई ‘मध्यम दूरी की परमाणु शक्ति संधि’ यानी आईएनएफ से खुद को अलग कर लिया. अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा, ‘अपने नाटो सहयोगियों के पूर्ण समर्थन के साथ अमेरिका इस नतीजे पर पहुंचा है कि रूस ने आईएनएफ संधि का उल्लंघन किया है और इसलिए अब अमेरिका भी संधि से जुड़े अपने दायित्यों का पालन नहीं करेगा.’

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शीत युद्ध के समय जब रूस ने यूरोपीय देशों की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात कर दी थीं, तब अमेरिका और सोवियत संघ ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे. ये संधि इन दोनों को जमीन से मार करने वाली मध्यम दूरी (500 से 5000 किमी) की ऐसी मिसाइलें बनाने से रोकती है जो परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम हों. आईएनएफ संधि से पश्चिमी देशों पर सोवियत संघ के परमाणु हमले का खतरा खत्म हो गया था.

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लेकिन बीते एक दशक से लगातार अमेरिकी खुफिया एजेंसियां रूस द्वारा मध्यम दूरी की मिसाइलें बनाने की सूचना दे रही थीं. बीते साल इन्होंने खबर दी कि रूस ने जमीन से मार करने वाली ‘9M729’ क्रूज मिसाइल को विकसित किया है जो 5000 किमी तक मार करने और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है. हालांकि, अमेरिका के आईएनएफ संधि से हटने की एक और बड़ी वजह चीन भी है. पिछले दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन जिस तरह की मिसाइलों का निर्माण किया है उसके चलते या तो उसे भी इस संधि में शामिल करना होगा या अमेरिका को इससे अलग हट जाना होगा.

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अगर संधि टूटने के बाद इसके खतरों की बात करें तो यूरोप पर फिर एक बार पहले जैसा खतरा मंडरा रहा है. जानकारों के मुताबिक अब रूस उसके खिलाफ फिर से मध्यम दूरी की मिसाइलें तैनात करेगा और अमेरिका यूरोपीय देशों में रूस के खिलाफ यही काम करेगा. संधि टूटने की वजह से एशिया में भी मिसाइलें तैनात करने की रेस शुरू हो सकती है. यहां के कई देशों में सुरक्षा देने के नाम पर अमेरिका मध्यम दूरी की मिसाइलें तैनात कर सकता है. उसने बीते हफ्ते इसके संकेत भी दिए हैं. एशिया में चीन के साथ शक्ति का संतुलन बनाने के लिए सबसे ज्यादा मिसाइलें भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान में तैनात किए जाने की उम्मीद है.

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आईएनएफ संधि के टूटने का सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका और रूस को ही होने जा रहा है. अब ये दोनों देश मध्यम दूरी की बैलेस्टिक मिसाइलें बड़े स्तर बनाकर बेच सकते हैं. लेकिन जानकारों का एक तबका यह भी मानता है कि अमेरिकी मिसाइलों की एशिया में तैनाती से चीन पर दबाव बढ़ना भी तय है. और इस वजह से वह अमेरिका के साथ एक नयी संधि में शामिल हो सकता है. ऐसा होने से भारत और जापान जैसे देशों की एक बड़ी मुश्किल हल हो सकती है.

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