अरुण जेटली

विचार और रिपोर्ट | आम बजट

अगले बजट में किसको फायदा और कैसा नुकसान देखने को मिल सकता है

मोदी सरकार लोकसभा चुनाव से ठीक पहले के इस बजट में ग्रामीण क्षेत्र और मध्यम वर्ग पर तोहफों की बरसात कर सकती है

ब्यूरो | 31 जनवरी 2019 | फोटो : पीआईबी

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भारत में चुनावी साल में बजट के मतदाताओं को लुभाने का दस्तावेज बन जाने की कमोबेश परंपरा ही रही है. 1991 में उदारीकरण के बाद से ही हमारे यहां आर्थिक सुधार के कार्यक्रम और लोकलुभावन घोषणायें अक्सर एक-दूसरे के समानातंर चलती रही हैं. आर्थिक जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार इस बार के अंतरिम बजट में भी कई तोहफों की बरसात कर सकती है.

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आर्थिक जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार आगामी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस बजट में ग्रामीण क्षेत्र और मध्यम वर्ग पर तोहफों की बरसात कर सकती है. इसके तहत किसानों की कर्जमाफी से लेकर मिनीमम बेसिक इनकम (न्यूनतम आय गारंटी) की तर्ज पर सीधे कैश ट्रांसफर जैसी घोषणायें की जा सकती हैं. मध्य वर्ग को आयकर दायरे में छूट दी जा सकती है. इसके अलावा जीएसटी और नोटबंदी के कारण नाराज चल रहे लघु और मध्यम वर्ग के कारोबारियों को भी राहत की सौगात मिल सकती है. जीएसटी में छूट से भी यह इशारा मिल ही चुका है.

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सवाल उठता है कि इस तरह की सौगातों वाले चुनावी बजट के लिए पैसे कहां से आएंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जीएसटी और अन्य वजहों से सरकार पहले ही राजस्व की कमी से जूझ रही है. जीएसटी लागू होने के बाद सरकार को अनुमान था कि इस वित्तीय वर्ष में वो इससे करीब साढ़े तेरह लाख करोड़ रुपये जुटा लेगी. लेकिन चालू वित्तीय साल के नौ महीनों में सिर्फ आठ लाख 73,000 करोड़ का कर संग्रह ही हुआ है. इसके अलावा टेलीक़ॉम सेक्टर और विनिवेश से आने वाला राजस्व भी लक्ष्य से पीछे है.

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ऐसे में सरकार आर्थिक सुधार की सबसे बड़ी शर्त राजकोषीय घाटे में कमी के अपने लक्ष्य से पीछे हट सकती है. जानकारों के मुताबिक, अगले वित्तीय वर्ष के लिए सरकार राजकोषीय घाटे की सीमा को बढाकर जीडीपी की 3.3 फीसदी कर सकती है. पहले यह लक्ष्य 3.1 फीसद था. कुछ जानकार राजकोषीय घाटे के पांच फीसद तक जाने की बात कह रहे हैं. जाहिर है कि इससे सुधार कार्यक्रमों को धक्का लगेगा और सरकार पर कर्ज का बोझ भी बढ़ेगा.

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सरकार अपनी आमदनी और खर्च के अंतर को कम करने की कोशिश कुछ और तरीकों से कर सकती है. मसलन आरबीआई से उसे 40-50 हजार करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है. राजस्व बढ़ाने के लिए वो अप्रत्यक्ष कर और माल भाड़े में वृद्धि कर सकती है. इसके अलावा वो शिक्षा और स्वास्थ्य के पहले से ही कम बजट को और कम भी कर सकती है. लेकिन फिर भी सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाना ही पड़ेगा जिसका बाजार और निवेशकों में अच्छा संदेश नहीं जाने वाला है. और इससे महंगाई में बढ़ोत्तरी भी देखने को मिल सकती है.

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