मनमर्जिया में तापसी पन्नू और अभिषेक बच्चन

ज्ञानकारी | वर्षांत

2018 में आए सबसे अनूठे बोलों वाले पांच गाने

अंधाधुन | मनमर्जियां | मुक्काबाज | दास देव | फन्ने खां

ब्यूरो | 31 दिसंबर 2018

1

ओ भाई रे – अंधाधुन – जयदेव साहनी

‘दिल जिगर क्या चीज है, दो किडनी ए-वन पीस है,’ किसी फिल्मी गाने की शुरूआती लाइन में ऐसे किसी कथन की उम्मीद शायद ही किसी को हो. बिन संदर्भ जाने ये लाइनें चौंकाती जरूर हैं लेकिन मजा भी दे जाती हैं. जयदेव साहनी के लिखे इन बोलों में किए गए कुछ अनोखे प्रयोग जैसे – ‘नैना भरम की कमाते हैं’ या ‘दिल का भी दिल कहां भरता है’ इसे अनोखा बनाते हैं. महज दो अंतरों वाला गाना इस सुपरहिट अल्बम का सबसे मजेदार गाना है. बाकी ‘आपसे मिलकर अच्छा लगा,’ ‘लैला-लैला,’ और ‘वो लड़की’ न सिर्फ बोलों के लिहाज से बल्कि संगीत के हिसाब से भी उतने ही बढ़िया और बार-बार सुने जाने लायक हैं.

2

चोंच लड़ियां – मनमर्जियां – शेली

‘मनमर्जियां’ के बेहद सुरीले गानों में से एक ‘चोंच लड़ियां’ के बारे में खुलकर कहा जा सकता है कि यह साल का सबसे अधिक सराहा गया गाना है. ‘सतलुज में इक समंदर नाचे,’‘बंदे अंदर पैगंबर नाचे’ से शुरू कर ‘पोरस दे विच सिकंदर’ और ‘अप्रैल मई विच दिसंबर नाचे’ तक पहुंचने वाला यह गाना इन्हीं चार लाइनों से उस ऊंचाई पर पहुंच जाता है, जहां पर इसे साल का कोई और गाना शायद छू भी नहीं पाता है. शेली की रची इस सुंदर कविताई को सीधे-सीधे भी दोहरा दिया जाता तो भी इनका जादू चलना ही था, लेकिन अमित त्रिवेदी का संगीत इसे एक अलग ही मुकाम पर पहुंचा देता है.

3

हाथापाई – मुक्काबाज – हुसैन हैदरी

हाथापाई के बोल कुछ इस तरह से शुरू होते हैं – ‘हम पहला धक्का नहीं मारे, हम पहला मुक्का नहीं जड़े.’ ये लाइनें सुनते हुए हर किसी को अपना बचपन याद आ जाता है जहां जब दोस्तों की आपसी लड़ाई और मारपीट होती थी तो सभी अपनी-अपनी मां के आगे शरीफ बनते हुए कुछ इसी तरह की लाइनें दोहराया करते थे. नॉस्टेल्जिया वाले टच के अलावा इस गाने में कुछ निहायत ही अनसुने से शब्दों का इस्तेमाल भी है, जैसे – उजलत और त्राहि-त्राहि. उजलत यानी जल्दबाजी तो है ही लेकिन त्राहि-त्राहि भी इस मायने में अनसुना है कि हाल-फिलहाल किसी कविता या गाने में इसका प्रयोग होते नहीं देखा गया है. हाथापाई के अलावा हुसैन हैदरी ने इस फिल्म के तीन गाने और लिखे थे.

4

आजाद कर – दास देव – गौरव सोलंकी

‘दास देव’ के आखिर में क्रेडिटस के साथ ‘आजाद कर’ गाना बजता है. यह गाना लेखक-गीतकार गौरव सोलंकी ने लिखा है. जरा पुराने अंदाज में कहें तो अपनी कहानियों-कविताओं से साहित्य की सेवा करने वाले सोलंकी ने यह बात इस गीत से भी साबित की है. बेमतलब बोलों वाले गानों के इस दौर में यह गाना न सिर्फ बेहद कर्णप्रिय एक कविता है बल्कि अपने आप में एक बड़ा दर्शन समेटकर खुद को सार्थक भी बनाता है. हकीकत से, कमालों से, गुनाहों से, सवालों से… आजाद किए जाने जैसे दिलचस्प और कई मायने साधने वाली ऐसी सार्थक कविताई शायद इस साल के इक्का-दुक्का गानों में ही होगी या नहीं भी होगी, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है.

5

मेरे अच्छे दिन कब आएंगे – फन्ने खां – इरशाद कामिल

फन्ने खां, इस फिल्म के हिंदू किरदार का स्टेजनेम है और इस गाने की शुरूआत भी कुछ इसी तरह के फ्यूजन से हुई है. जब पहली ही लाइन में इरशाद कामिल ‘खुदा, तुम्हें परनाम है सादर’ लिखते हैं तो उन्हें धन्यवाद कहने की इच्छा होने लगती है. साल 2014 के आमचुनावों के दौरान लोकप्रिय हुए भाजपा के नारे ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का खुलकर इस्तेमाल करता है. इसके बोलों में शामिल ‘इकलौती चादर,’ ‘दो रोटी और एक लंगोटी’ जैसी शिकायतें जहां इसे हर समय में मौजूं बनाती हैं वहीं अच्छे दिनों का पता पूछने वाला इसका मुखड़ा इसे वर्तमान समय का सबसे करारा राजनीतिक तंज बना देता है.

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