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अगर पुलिस एफआईआर लिखने से इनकार कर दे तो क्या करना चाहिए?

अक्सर यह शिकायत की जाती है कि पुलिस अपेक्षाकृत छोटे अपराधों और कमजोर तबके से आने वाले लोगों की रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर देती है

ब्यूरो | 01 अगस्त 2019 | फोटो: ट्विटर-मुंबई पुलिस

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अपराध प्रक्रिया संहिता (क्रिमिनल प्रोसीजर कोड या सीआरपीसी) के अनुसार दो तरह के अपराध बताए गए हैं – संज्ञेय और असंज्ञेय. संज्ञेय अपराधों में बलात्कार, हत्या, अपहरण, लूटपाट वगैरह शामिल हैं. असंज्ञेय अपराधों में धोखाधड़ी, जालसाजी, मानहानि या पारिवारिक मामले आते हैं. सीआरपीसी की धारा-156 के तहत पुलिस केवल संज्ञेय अपराधों के लिए ही सीधे रिपोर्ट दर्ज कर सकती है. असंज्ञेय अपराधों के लिए मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज होती है जहां से पुलिस को आगे जांच या गिरफ्तारी का आदेश दिया जाता है.

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किसी संज्ञेय अपराध के लिए पुलिस थाने जाने की बजाय उसकी ऑनलाइन रिपोर्ट करना एक आसान तरीका हो सकता है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, तमिलनाडु समेत कई राज्य पुलिसों की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन एफआईआर फाइल की जा सकती है. लेकिन जहां पर यह सुविधा मौजूद न हो वहां पुलिस थाने जाना ही एकमात्र विकल्प होता है. ऐसे में अगर पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने से इंकार करती है तो पहला उपाय इसके उच्च अधिकारियों तक जाना होता है. सीआरपीसी की धारा 154(3) के तहत इसके लिए पुलिस अधीक्षक (एसपी), पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) या पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) के पास लिखित शिकायत भेजी जा सकती है. ये अधिकारी जरूरत के मुताबिक खुद मामले की जांच करता है या अपने मातहतों को रिपोर्ट दर्ज करने और कार्रवाई करने का आदेश देता है. आमतौर पर शिकायत को रजिस्टर्ड डाक से भेजे जाने की सलाह दी जाती है जिससे जरूरत पड़ने इसकी पावती (रिसीप्ट) को सबूत के तौर पर पेश किया जा सकेे.

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शिकायतकर्ता के पास अपनी शिकायत को पास के न्यायिक अधिकारी के पास भी दर्ज करवाने का अधिकार होता है. सीआरपीसी की धारा 156(3) और 190 के तहत ज्युडिशियल या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है. इसके बाद मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी कर सकते हैं.

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शिकायत दर्ज न करने के दोषी पुलिस अधिकारी की शिकायत राज्य मानवाधिकार आयोग या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास भी की जा सकती है. इस लिंक पर जाकर यह शिकायत ऑनलाइन दर्ज करने का विकल्प भी शिकायतकर्ता के पास मौजूद है.

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कुछ मामलों में संबंधित हाई कोर्ट में भी रिट पटीशन भी दायर की जा सकती है. इसके बाद हाई कोर्ट दोषी पुलिस अधिकारी को परमादेश (रिट ऑफ मैंडेमस) जारी कर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता है या पहले ऐसा ना करने के लिए कारण बताने को कहता है. रिट पटीशन तभी दाखिल की जा सकती है जब उचित समय पर पुलिस कार्रवाई ना होने के चलते किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का हनन हुआ हो.

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