हॉकी वर्ल्डकप - भुवनेश्वर

ज्ञानकारी | खेल

ओडिशा में खेले जा रहे हॉकी विश्व कप-2018 से जुड़ी पांच रोचक बातें

चौदहवें हॉकी विश्व कप का आयोजन ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में किया जा रहा है और इसका फाइनल मैच 16 दिसंबर को होना है

ब्यूरो | 13 दिसंबर 2018 | फोटो: हॉकी इंडिया-फेसबुक

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भारत को तीसरी बार हॉकी विश्वकप की मेजबानी करने के मौका मिला है. भुवनेश्वर के पहले 1982 में मुंबई और 2010 में दिल्ली में हॉकी विश्व कप के आयोजन हो चुके हैं. इससे पहले तक विश्व कप में केवल 12 टीमें ही होती थीं, लेकिन इस बार इसमें 16 टीमें हिस्सा ले रही हैं. इनमें दो टीमें – दक्षिण कोरिया और जापान – इस टूर्नामेंट में शामिल नहीं हो पाईं. 2002 में भी इस आयोजन में टीमों की संख्या बढ़ाई गई थी लेकिन फिर इसे 12 ही कर दिया गया. इस बार यह फॉर्मेट सफल होता दिख रहा है जिससे इसके आगे भी जारी रहने की संभावना है.

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इस बार विश्व कप में दो ऐसी टीमें भी शामिल हुई हैं जिनमें से एक ने इससे पहले कभी विश्वकप नहीं खेला था और दूसरी करीब तीन दशक बाद इसमें वापसी कर रही है. ये टीमें चीन और फ्रांस हैं. अब तक केवल एशियन गेम्स और एशिया कप में नज़र आने वाली चीन की पुरूष हॉकी टीम पहली बार विश्व कप में शिरकत कर रही है. फ्रांस ने इससे पहले 1990 में हॉकी विश्व कप खेला था.

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टीमों की संख्या बढ़ने के साथ ही इस बार खेल के नियमों में भी बदलाव किए गए. पहले जहां 6-6 टीमों के दो ग्रुप बनाए जाते थे, वहीं इस बार 4-4 टीमों के चार ग्रुप बनाए गए. दिलचस्प यह है कि हर ग्रुप में अव्वल रहने वाली दो टीमों को सीधे क्वार्टर फाइनल में जगह मिलेगी जबकि नीचे वाली दोनों टीमें टूर्नामेंट से बाहर हो जाएंगी. इसी के साथ ये विश्व कप चार क्वार्टर फाइनल वाला पहला हॉकी विश्व कप बन जाएगा.

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हॉकी जैसे बेहद रोमांचक खेल को बढ़ावा देने के साथ-साथ ये आयोजन अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा करने की कोशिश करता भी दिख रहा है. इस बार हॉकी विश्व कप का मैसकट (शुभंकर) ‘ऑलिव रिडली सी टर्टल’ है जिसे ‘ओली’ नाम दिया गया है. कछुओं की यह लुप्तप्राय प्रजाति प्रशांत तथा हिंद महासागर में पाई जाती हैं और हर साल ये हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर ओडिशा के तटों पर प्रवास के लिए आते हैं.

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इस विश्व कप से कुछ खूबसूरत कहानियां भी जुड़ती हैं. इनमें से सबसे ज्यादा चर्चित कहानी भारतीय खिलाड़ी हार्दिक सिंह की है जो पहली बार विश्व कप खेल रहे हैं. उनकी खास बात यह है कि मात्र पांच सालों में उन्होंने बॉल बॉय से भारतीय टीम का सदस्य बनने तक का सफर तय किया है. भारतीय टीम में अवसर न मिलने से नाराज होकर उन्होनें देश से बाहर जाकर क्लब हॉकी खेलने की तैयारी कर ली थेी. लेकिन बाद में परिवार वालों के समझाने पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. महज 19 साल के हार्दिक सिंह टीम में मिडफील्डर की भूमिका निभाते हैं.

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