ईद, नमाज़, इस्लाम, मस्जिद

ज्ञानकारी | धर्म

ईद हर साल अलग-अलग मौसम में क्यों पड़ती है?

रमज़ान का महीना खत्म होने के बाद पहला चांद दिखाई देने पर ईद मनाई जाती है

ब्यूरो | 05 मई 2019 | फोटो: फ्लिकर

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शहादा, सलात, साम, ज़कात और हज इस्लाम के पांच स्तंभ बताए जाते हैं. शहादा यानी अल्लाह पर विश्वास, सलात यानी पांच वक्त की प्रार्थना (नमाज़), ज़कात यानी दान-पुण्य, हज यानी मक्का की तीर्थयात्रा और साम यानी रमज़ान के महीने में रोजे रखना. इस्लाम को मानने वाले इस महीने में लगातार तीस दिनों तक सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच रोज़ा रखते हैं यानी इस दौरान कुछ भी खाते-पीते नहीं हैं.

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रमज़ान इस्लामिक या हिज़री कैलेंडर का नवां महीना है और ईद इसी कैलेंडर के दसवें महीने (शव्वाल) की पहली तारीख. हिज़री कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित होता है. यानी हिज़री कैलेंडर में नए महीने की शुरुआत नया चांद दिखने के साथ होती है. इसके उलट, लगभग दुनियाभर में इस्तेमाल किया जाने वाला ग्रेगोरियन कैलेंडर सूर्य की गति पर आधारित होता है.

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इन कैलेंडरों में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के अनुसार गणना होने के चलते हर साल दस दिनों का फर्क आ जाता है. इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि ग्रेगोरियन कैलेंडर में जहां 365 दिन होते हैं, वहीं हिज़री कैलेंडर में केवल 355 दिन ही होते हैं. इस फर्क के कारण रमज़ान का महीना ग्रेगोरियन कैलेंडर में हर साल दस दिन पीछे चला जाता है.

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कैलेंडरों में फर्क होने के अलावा इस्लाम के अलग-अलग फिरक़ों में भी नए महीने की शुरूआत निर्धारित करने के अलग-अलग तरीके हैं. ज्यादातर फिरके जहां चंद्रमा पर आधारित कैलेंडर पर भरोसा करते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो नए चांद का उदय जानने के लिए वैज्ञानिक तरीकों पर भरोसा करते हैं.

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साथ ही, कहीं-कहीं पर लोग स्थानीय समुदाय प्रमुख द्वारा चांद के देखे जाने की घोषणा का भी इंतज़ार करते हैं और इससे रमज़ान की शुरूआत मानी जाती है या ईद मनाने की घोषणा की जाती है. इसलिए कई बार कई जगहों पर ईद मनाने का दिन भी अलग-अलग हो जाता है.

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