सरोगेसी, गर्भवती महिला, मां और बच्चा

ज्ञानकारी | कानून

सरोगेसी विधेयक से जुड़ी पांच बातें जो आपको जाननी चाहिए

हाल ही में सरोगेसी (किराए की कोख) नियामक विधेयक लोकसभा में पारित कर दिया गया है

ब्यूरो | 30 दिसंबर 2018 | फोटो: पिक्साबे

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पहली बार साल 2016 में लाया गया सरोगेसी बिल, सरोगेसी के व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाता है. यह किराए की कोख और भ्रूण या अंडाणुओं की खरीद-बेच को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है. यह कानून बनने के बाद सरोगेसी के जरिए बच्चा चाहने वाले मां-बाप, सरोगेट मां को दवाइयों और अस्पताल के खर्च के अलावा धन या किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं दे सकते हैं.

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विधेयक ‘एल्ट्रुइस्टिक सरोगेसी’ यानी परोपकार की भावना से की गई सरोगेसी को ही वैध ठहराता है. इसके अनुसार माता या पिता की कोई रक्त संबंधी ही उनके बच्चे को जन्म दे सकती है और इस संबंधी को भी किसी तरह से धन या संपत्ति के रूप में भुगतान नहीं किया जा सकता है. इसके साथ ही यह कानून किसी महिला को अपने जीवन में केवल एक बार ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म देने की अनुमति देगा.

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सरोगेसी बिल केवल कानूनी रूप से विवाहित जोड़े को ही सरोगेसी के जरिए माता-पिता बनने का अधिकार देता है. इसके लिए उनकी शादी को कम से कम पांच साल का वक्त बीत जाना भी जरूरी है. इस तरह सरोगेसी के समय होने वाली मां की उम्र 23 से 50 और पिता की उम्र 26 से 53 साल निर्धारित की गई है. लिव-इन में रहने वाले जोड़े, सिंगल या अपने साथी को खो चुके लोग और समलैंगिक जोड़े इसके जरिए संतान नहीं पा सकते हैं.

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सरोगेसी बिल, सरोगेट महिला को यह अधिकार देता है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था उसे गर्भ गिराने पर मजबूर नहीं कर सकती है.

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सरोगेसी सेवाएं केवल इसके लिए रजिस्टर्ड संस्थाएं और क्लीनिक ही दे सकते हैं. इसके लिए बिल ‘अप्रोप्रिएट अथॉरिटी’ की बात करता है जो सरोगेसी क्लीनिक के रजिस्ट्रेशन और मानक तय करने का काम करेंगी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट पर आधारित

  • मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा

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