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2018 में महिलाओं के हक में आए पांच बड़े अदालती फैसले

सुप्रीम कोर्ट समेत देश भर की अदालतों ने 2018 में महिलाओं के हक में कई अहम फैसले सुनाए

ब्यूरो | 28 दिसंबर 2018 | फोटो: यूट्यूब

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पैतृक संपत्ति में बेटी का भी बराबर का हिस्सा

इस साल फरवरी में आए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 से पहले पैदा हुई बेटियों पर भी लागू होता है. मतलब कि अब बेटियां जन्म से ही पैतृक संपत्ति में हमवारिस होंगी. अदालती फैसले के मुताबिक यह कानून 2005 से पहले के सभी संपत्ति विवादों और लंबित मामलों पर भी लागू होगा. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 पैतृक संपत्ति में बेटा-बेटी दोनों को बराबर का हिस्सा देने की बात करता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक महिला का इस संपत्ति पर बराबरी का मालिकाना हक है, वह चाहे तो इसे बेच सकती है, या किसी के नाम कर सकती है. यहां तक कि महिला चाहे तो इस संपत्ति से अपने बच्चे को भी बेदखल कर सकती है. अपने फैसले में अदालत का यह भी कहना था कि विवाह के बाद यदि बेटी का वैवाहिक जीवन सही तरह से न चले तो यह पैतृक संपत्ति उसके सम्मानजनक जीवन का आधार बन सकती है.

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खतना असंवैधानिक

इसी साल अगस्त में आए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में लड़कियों का खतना करने की प्रथा पर सवाल उठाते हुए इसे असंवैधानिक बताया. अदालत के मुताबिक लड़कियों का जीवन सिर्फ शादी करने और पति को खुश करने के लिए नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज के समय में जब महिला अधिकारों को बढ़ावा दिया जा रहा है तो ऐसे में इन्हें उलटी दिशा में कैसे जाने दिया जा सकता है. मुस्लिमों के दाऊदी बोहरा समुदाय में छोटी लड़कियों का खतना किया जाता है. इस प्रक्रिया में लड़कियों के जननांग के बाहरी हिस्से को काट कर निकाल दिया जाता है. खतने के कारण यौन संक्रमण के साथ-साथ बांझपन की भी संभावना बढ़ जाती है. साथ ही ज्यादा खून बहने से कभी-कभी बच्चियों की मौत तक हो जाती है.

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दहेज के मामले में सीधी गिरफ्तारी

एक अन्य अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज के मामले में महिला की शिकायत पर पति और ससुराल वालों को तुरंत गिरफ्तार करने का आदेश दिया. शीर्ष अदालत ने पिछले साल के अपने फैसले को पलटते हुए कहा कि अब गिरफ्तारी में परिवार कल्याण समीति की कोई भूमिका नहीं होगी. हालांकि आरोपितों के पास अग्रिम जमानत लेने का अधिकार फिलहाल बरकरार है. धारा 498 ए के दुरुपयोग पर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान पिछले साल शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों में सीधी गिरफ्तारी रोक लगा दी थी. दहेज उत्पीड़न एक ग़ैर जमानती अपराध है. आईपीसी की धारा 498 ए के तहत दहेज आरोपितों को न्यूनतम तीन साल की सजा का प्रावधान है. एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश भर में औसतन 21 महिलाएं हर दिन दहेज हत्या का शिकार होती हैं.

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एकल मां पिता का नाम बताने के लिए बाध्य नहीं

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि एकल मांओं को बच्चे के जन्म के पंजीकरण या किसी अन्य मौके पर पिता का नाम बताए जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. यह फैसला विवाहित और अविवाहित दोनों एकल मांओं पर लागू होता है. एकल मांओं में मूलत: विधवा, तलाकशुदा, परित्यक्ता और अविवाहित माएं आती हैं. मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला एकल मांओं के संबंध में लिए गए पूर्व फैसलों की अगली कड़ी के तौर पर दिखता है. उम्मीद की जा सकती है कि यह फैसला ऐसी मांओं की चुनौतियों को कम करने के साथ ही उनके प्रति समाज की मानसिकता को बदलने की जमीन भी तैयार करेगा.

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पत्नी के रंग पर तंज तलाक का आधार

इसी साल पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पति द्वारा अपनी पत्नी के रंग को लेकर तंज कसना तलाक का आधार हो सकता है. अदालत ने यह फैसला महेंद्रगढ़ जिले की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया. कोर्ट ने कहा कि पति का महिला के रंग पर टिप्पणी करना न सिर्फ दुर्व्यवहार है, बल्कि एक किस्म की मानसिक क्रूरता भी है. भारतीय समाज में बहुत सी लड़कियों को न सिर्फ ससुराल में बल्कि अपने मायके में भी रंगभेद का शिकार होना पड़ता है.

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