एनसीसी की महिला कैडेटस

ज्ञानकारी | कानून

एनसीसी एक्ट में सुधार का केरल हाई कोर्ट का आदेश ऐतिहासिक क्यों माना जा रहा है?

केरल हाईकोर्ट ने यह फैसला तिरुवनंतपुरम की हिना हनीफा द्वारा दायर की गई एक याचिका पर सुनाया है

ब्यूरो | 16 मार्च 2021 | प्रतीकात्मक फोटो: विकीमीडिया कॉमंस

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मामला क्या है?

तिरुवनंतपुरम में पढ़ने वाली हिना हनीफा ने केरल हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. 23 साल की इस ट्रांसजेंडर का कहना था कि उसे अपनी लैंगिक पहचान के चलते एनसीसी की सीनियर्स गर्ल्स डिविजन में शामिल नहीं होने दिया जा रहा है. हिना का जन्म केरल के मलप्पुरम शहर में तीन बहनों के इकलौते भाई के रूप में हुआ था, लेकिन 20 साल की उम्र में उन्होंने ‘सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी’ करवा ली. इसके बाद उन्होंने तिरुवनंतपुरम के यूनिवर्सिटी कॉलेज में ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए आरक्षित दो सीटों में से एक पर दाखिला लिया. यहीं वे एनसीसी की गर्ल्स डिविजन जॉइन करना चाहती थीं, लेकिन एनसीसी एक्ट का हवाला देकर उन्हें मना कर दिया गया. इसके खिलाफ उन्होंने एनसीसी के कमांडिंग ऑफिसर के पास अपील की. जब कोई जवाब नहीं आया तो नवंबर 2019 में हिना केरल हाई कोर्ट पहुंच गईं.

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अदालत में क्या-क्या हुआ?

केरल हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान काफी बहस हुई. केंद्र का तर्क था कि एनसीसी में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को नहीं लिया जा सकता क्योंकि 1948 के इस एक्ट की धारा छह सिर्फ पुरुष और महिला कैडेटों की भर्ती की बात करती है. उधर, हिना की दलील थी कि यह धारा न सिर्फ केरल के ट्रांसजेंडर कानून के खिलाफ है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का भी उल्लंघन है जो सभी नागरिकों को समान अधिकार देते हैं. अदालत ने भी इस दलील से सहमति जताई. हाई कोर्ट ने कहा कि दुनिया आगे निकल चुकी है और केंद्र सरकार 19वीं सदी में ही जी रही है. उसने विश्वविद्यालय प्रशासन से यह भी कहा कि मामले का फैसला होने तक वह एनसीसी की संबंधित इकाई में एक सीट हनीफा के लिए सुरक्षित रखे.

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अपने फैसले में अदालत ने क्या कहा?

15 मार्च को जस्टिस अनु शिवरमन की एक सदस्यीय खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाया. उसके मुताबिक याचिकाकर्ता को यह तर्क देकर एनसीसी से दूर नहीं रखा जा सकता कि संबंधित कानून में थर्ड जेंडर का जिक्र नहीं है या फिर थर्ड जेंडर के लोगों को सशस्त्र बलों या एनसीसी में शामिल करने के लिए जरूरी दिशा-निर्देश नहीं बने हैं. फैसले में कहा गया है कि 1948 में बने एनसीसी एक्ट के प्रावधान 2019 के ट्रांसजेंडर अधिकार कानून के क्रियान्वयन को नहीं रोक सकते. जस्टिस अनु शिवरमन का कहना था, ‘मेरा विचार है कि याचिकाकर्ता को एनसीसी की सीनियर गर्ल्स डिविजन में शामिल होने का अधिकार है.’ अदालत ने यह भी कहा कि एनसीसी एक्ट की धारा छह को छह महीने के भीतर सुधारा जाए ताकि यह कानून सबके लिए बराबर हो.

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केरल की ट्रांसजेंडर नीति क्या है?

केरल ने 2015 में ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) एक्ट’ लाकर इस समुदाय के कल्याण के लिए नीति बनाने की पहल की थी. ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य था. इस नीति के तहत राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड के अलावा हर जिले में ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड बनाए गए. नई नीति में यह भी कहा गया कि सरकारी दफ्तरों और दूसरी जगहों पर ट्रांसजेंडर समुदाय से कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. साथ ही इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चों तक इस समुदाय की पहुंच बेहतर बनाने की भी बात की गई. इस नीति में भेदभाव के खिलाफ लड़ रहे ट्रांसजेंडर लोगों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता का भी प्रावधान था और उनके लिए 24 घंटे एक हेल्पलाइन चलाने की भी बात कही गई थी. सरकार ने ऐसे लोगों की ‘सेक्स चेंज सर्जरी’ के लिए पांच लाख रुपये देने का भी प्रावधान किया था. 55 साल से ज्यादा उम्र वाले ऐसे ट्रांसजेंडरों के लिए मासिक पेंशन की भी व्यवस्था की गई थी जो बेघर हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दे चुका है

अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रांसजेंडर को ‘थर्ड जेंडर’ घोषित किया था. उसने कहा था कि संविधान के तहत सुनिश्चित सभी मौलिक अधिकार इस समुदाय के लोगों को भी मिलने चाहिए. शीर्ष अदालत ने सभी ट्रांसजेंडर लोगों को आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों को मिलने वाले सभी अधिकार देने की बात कही थी. साथ ही, उसने केंद्र को निर्देश दिए थे कि वह इस समुदाय के लोगों तक अवसरों और सुविधाओं की समान पहुंच सुनिश्चित करे. इसी फैसले को आधार बनाते हुए केरल सरकार ने अपनी ट्रांसजेंडर नीति बनाई थी. इसके बाद संसद ने भी ट्रांसजेंडर पर्संस (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 2019 को पारित किया था. हालांकि इसके कुछ प्रावधान अभी भी विवादों के घेरे में हैं. अब केरल हाई कोर्ट के ताजा फैसले को इसके आगे की कड़ी माना जा रहा है क्योंकि इससे सैन्य और अर्ध सैन्य बलों में ट्रांसजेंडर समुदाय के आने का रास्ता खुल सकता है.

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