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ज्ञानकारी | सोशल मीडिया

‘ट्रेसेबिलिटी’ क्या है और इससे वाट्सएप यूजर्स पर क्या फर्क पड़ेगा?

वाट्सएप जैसी सोशल मीडिया कंपनियों के लिए लाए गए केंद्र के नये नियमों पर फिर बहस गर्म है

ब्यूरो | 03 जून 2021 | फोटो: पिक्सबे

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‘ट्रेसेबिलिटी’ क्या है?

हाल ही में केंद्र सरकार सोशल और डिजिटल मीडिया कंपनियों के लिए नए नियम लाई है. इन्हें सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ संस्‍थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 या संक्षेप में आईटी रूल्स 2021 कहा गया है. इनका औचित्य बताते हुए सरकार का कहना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल पर चिंता जताई जा रही थी और इसे रोकने के लिए कोई व्यवस्था बनाने की मांग हो रही थी. नए नियमों के मुताबिक वाट्सएप सहित तमाम सोशल मीडिया कंपनियों को जरूरत पड़ने पर सरकार को यह जानकारी देनी होगी कि किसी संदेश की शुरुआत किसने की, यानी कोई मैसेज पहली बार किसके फोन से भेजा गया. यही ‘ट्रेसेबिलिटी’ का कॉन्सेप्ट है. फेसबुक के स्वामित्व वाली वाट्सऐप ने इसके खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है.

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इसका विरोध क्यों हो रहा है?

तकनीक के जानकारों को आशंका है कि ‘ट्रेसेबिलिटी’ से लोगों की निजता खतरे में पड़ जाएगी. वाट्सएप ने अपनी याचिका में इस नियम को असंवैधानिक बताते हुए इसके अमल पर रोक लगाने की मांग की है. एक अलग बयान में कंपनी का कहना है कि लगातार डिजिटल होती जा रही दुनिया में कुछ नियम-कायदे तो होने चाहिए लेकिन वे उचित हों, अनावश्यक नहीं. कंपनी ने ‘ट्रेसेबेलिटी’ को लोगों की निजता यानी प्राइवेसी पर हमला, मानवाधिकारों का उल्लंघन और निर्दोष लोगों को जोखिम में डालने जैसा बताया है और कहा है कि यह कोई समाधान नहीं है. वाट्सएप का यह भी कहना है कि लोगों के आपसी संदेशों की प्राइवेसी बनी रहे, इसके लिए वह हर मुमकिन कोशिश करेगी और यही वजह है कि वह ‘ट्रेसेबिलिटी’ का विरोध कर रही है.

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‘ट्रेसेबिलिटी’ व्यापक निगरानी की तरह क्यों होगी?

वाट्सएप ने एंड-टू-एंड इनक्रिप्शन को 2016 में अपने एप में लागू किया था. इस तकनीक का मकसद यह था कि लोग अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को जो मैसेज, तस्वीरें, वीडियो आदि भेजते हैं उन्हें कोई तीसरा न देख सके यहां तक कि वाट्सएप भी नहीं. ‘ट्रेसेबिलिटी’ की शर्त लागू होने के बाद वाट्सएप की यह खासियत खत्म हो जाएगी. इतना ही नहीं, उसे और दूसरे प्राइवेट मैसेजिंग एप्स को हर दिन शेयर होने वाले अरबों मैसेज्स का रिकॉर्ड स्टोर करके रखना होगा. एक मैसेज को ट्रेस करने के लिए भी कंपनी को हर मैसेज ट्रेस करना होगा. वाट्सएप का कहना है, ‘ऐसा इसलिए कि कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि सरकार को कौन सा मैसेज चाहिए होगा.‘ कंपनी के मुताबिक यह जनता की व्यापक निगरानी का एक नया स्वरूप है. यह भी माना जा रहा है कि इसकी वजह से कंपनियां यूजर्स की ज्यादा से ज्यादा जानकारियां इकट्टा करेंगी जिसका बहुत से लोग पहले से ही विरोध कर रहे हैं.

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ट्रेसेबिलिटी मानवाधिकारों का उल्लंघन कैसे हो सकती है?

जानकारों के मुताबिक ‘ट्रेसेबिलिटी’ निजी कंपनियों को इसके लिए मजबूर करती है कि वे उन लोगों का नाम जाहिर करें जिन्होंने कथित रूप से कोई ऐसा मैसेज शेयर किया है जिस पर सरकार को आपत्ति है. भले ही मैसेज उन्होंने न बनाया हो या उन्होंने इसे कोई चिंता जताते हुए शेयर किया हो या फिर किसी को यह मैसेज इसकी सच्चाई जानने के लिए भेजा हो. जानकारों का मानना है कि इस तरह का रवैय्या निर्दोष लोगों को जांच के फंदे में फंसा सकता है और अगर वह संदेश सरकार के लिए समस्या बना हुआ हो तो ऐसे लोग जेल भी जा सकते हैं. वाट्सएप के मुताबिक अगर किसी को यह डर होगा कि उसके लिखे या भेजे हुए किसी भी मैसेज से कोई उस तक पहुंच सकता है, तो लोग निजी स्पेस में भी मन की बात करते हुए डरेंगे. कंपनी का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों का उल्लंघन है.

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क्या ‘ट्रेसेबिलिटी’ से कोई बात बनेगी?

वाट्सएप के मुताबिक इसका जवाब है, नहीं. कंपनी का कहना है कि मैसेज ट्रेसिंग अप्रभावी कवायद तो है ही, इसके दुरुपयोग की भी काफी संभावना है. मान लीजिए, आपने कोई इमेज डाउनलोड की और फिर इसे शेयर किया या फिर कोई स्क्रीनशॉट लेकर ऐसा किया तो आपको ही सबसे पहले मैसेज भेजने वाला यानी ‘ऑरिजिनेटर’ माना जा सकता है. जानकारों के मुताबिक इसके अलावा अपराधों की जांच कानूनी तरीके से जिस प्रक्रिया से की जाती है ‘ट्रेसेबिलिटी’ उसे उलट देगी. मसलन आम तौर पर किसी अपराध की जांच करते हुए पुलिस या कोई अन्य सरकारी एजेंसी टेक्नॉलॉजी कंपनियों से संबंधित व्यक्ति के अकाउंट से जुड़ी जानकारी मांगती हैं. लेकिन ‘ट्रेसेबिलिटी’ का नियम लागू होने के बाद कोई एजेंसी किसी कंपनी को कोई मैसेज या तस्वीर देंगी और पूछेगी कि इसे सबसे पहले किस व्यक्ति ने भेजा.

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