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ज्ञानकारी | कानून

क्या किसी सामान्य नागरिक के शव को तिरंगे से ढका जा सकता है?

उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक किसान के शव को तिरंगे से ढकने पर उसके परिजनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है

ब्यूरो | 10 फरवरी 2021 | फाइल फोटो : फेसबुक

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क्या हुआ है?

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में एक किसान परिवार पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप लगा है. बीते हफ्ते इस परिवार के एक युवक – बलजिंदर सिंह – का अंतिम संस्कार किया गया था. इस दौरान उसके शव को तिरंगे से ढककर श्मशान घाट तक ले जाया गया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बलजिंदर की शव यात्रा का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पीलीभीत पुलिस ने उसकी मां जसवीर कौर और छोटे भाई गुरविंदर सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि शव को तिरंगे से ढंकना कानूनी रूप से गलत है और इससे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान हुआ है. बीती 23 जनवरी को बलजिंदर किसान आंदोलन में शामिल होने दिल्ली स्थित गाजीपुर बॉर्डर गया था. इसके कुछ रोज बाद उसका शव गाजियाबाद में सड़क के किनारे मिला था.

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कानून क्या कहता है?

पीलीभीत पुलिस ने बलजिंदर सिंह की मां और भाई के खिलाफ राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा-2 के तहत मामला दर्ज किया है. यह कानून 23 दिसंबर, 1971 को लागू किया गया था. इसमें भारतीय राष्ट्रीय प्रतीकों, जैसे राष्ट्रीय ध्वज, संविधान, राष्ट्रगान और भारतीय मानचित्र के अपमान को रोकने के मकसद से दंड के प्रवधान किये गये हैं. इसके अनुसार कोई भी ऐसा व्यक्ति ‘जो किसी सार्वजनिक स्थान पर या या किसी भी ऐसे स्थान पर जो जनता को दृष्टिगोचर हो किसी अन्य स्थान में, भारत के राष्ट्रीय ध्वज अथवा भारत के संविधान या उसके किसी भाग को जलाएगा, विकृत करेगा, विरूपित करेगा, दूषित करेगा, कुरूपित करेगा, कुचलेगा या अन्यथा (मौखिक या लिखित शब्दों या कृत्यों द्वारा) अपमान करेगा, उसे तीन वर्ष तक के कारावास से, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा.’

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शवों पर तिरंगे के इस्तेमाल संबंधी नियम

राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा-2 में झंडे के अपमान के बारे में भी विस्तार से बताया गया है. इसमें लिखा है कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का ‘राजकीय अंत्येष्टियों या सशस्त्र सैन्य बलों या अन्य अर्धसैनिक बलों की अंत्येष्टियों के सिवाय किसी अन्य रूप में लपेटने के लिए उपयोग करना’ उसके प्रति अनादर को दर्शायेगा. साल 2002 में भारत सरकार ‘भारतीय झंडा संहिता-2002‘ लायी थी. इसमें भी अंत्येष्टियों के दौरान झंडे के इस्तेमाल को और भी गहराई से बताया गया है. इस संहिता के अनुच्छेद-3.58 में यह भी कहा गया है, ‘राजकीय/सैनिक/केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के सम्मान से युक्त अंत्येष्टि के अवसरों पर शवपेटिका (ताबूत) या अर्थी झंडे से ढक दी जायेगी और झंडे का केसरिया भाग ताबूत या अर्थी के ऊपरी हिस्से की ओर रहेगा. झंडे को कब्र में दफनाया या चिता में जलाया नहीं जाएगा.’

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क्या राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि सिर्फ सैनिकों या राजनीतिज्ञों की ही हो सकती है?

जिस व्यक्ति को राजकीय सम्मान दिया जाता है, उनके अंतिम सफर का इंतजाम राज्य या केंद्र सरकार की तरफ से किया जाता है. उनके शव को तिरंगे में लपेटा जाता है, उन्हें बंदूकों से सलामी दी जाती है. आम तौर पर (अंत्येष्टि के दौरान) राजकीय सम्मान बड़े नेताओं को दिया जाता है, जिनमें प्रधानमंत्री, मंत्री और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे लोग शामिल होते हैं. लेकिन देश की अन्य चर्चित हस्तियों की भी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ हुई है और उनके शवों को भी तिरंगे से ढका गया है. इन हस्तियों में मदर टेरेसा, सत्य साई बाबा, शशि कपूर और श्री देवी के नाम शामिल हैं. कानून के जानकारों के मुताबिक किस व्यक्ति को राजकीय सम्मान दिया जाएगा, यह राज्य सरकार तय करती है. कानून और संसदीय मामलों के पूर्व मंत्री एमसी ननाइयाह का कहना है कि ‘राजकीय सम्मान देने का फैसला राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करता है. वो इस बात का फैसला करती है कि व्यक्ति विशेष का कद क्या है और इसी हिसाब से तय किया जाता है कि उसे राजकीय सम्मान दिया जाना चाहिए या नहीं. इसे लेकर कोई तय दिशा-निर्देश नहीं हैं.’

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इससे पहले भी ऐसे विवाद हुए हैं

28 सितम्बर, 2015 की रात को उत्तर प्रदेश की दादरी तहसील के बिसाहड़ा गांव में गौमांस रखने के आरोप में कुछ लोगों ने 52 साल के मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर कर हत्या कर दी थी. पुलिस ने इस मामले में 18 लोगों को आरोपित बनाया था. इनमें एक आरोपित रवि सिसौदिया भी था. रवि को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था. करीब एक साल बाद 07 अक्टूबर, 2016 को स्वास्थ्य कारणों के चलते उसकी जेल में मौत हो गयी थी. इसके बाद जब उसका शव कांच के ताबूत में बिसाहड़ा गांव पहुंचा तो गांव वालों ने रवि को शहीद बताते हुए उसके ताबूत को तिरंगे से ढक दिया था. हत्या के आरोपित का शव तिरंगे से ढकने पर उस समय काफी विवाद हुआ था और सोशल मीडिया पर लोगों ने इस पर खासी नाराजगी व्यक्त की थी. हालांकि उत्तर प्रदेश पुलिस ने तिरंगे के अपमान को लेकर उस समय कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की थी.

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