किसान आंदोलन

ज्ञानकारी | किसान

एमएसपी पर किसानों और सरकार के बीच आखिर पेंच कहां फंसा है?

जब मोदी सरकार किसानों को एमएसपी की लिखित गारंटी देने को तैयार है तो कड़ाके की ठंड में भी वे अपना आंदोलन खत्म क्यों नहीं करते?

अभय शर्मा | 22 दिसंबर 2020 | फोटो : यूथ फॉर स्वराज

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दिल्ली से लगती हरियाणा और पंजाब की सीमा पर बीते 25 दिनों से लाखों की संख्या में किसान आंदोलन कर रहे हैं. किसानों और सरकार के बीच यह जंग तब शुरू हुई थी, जब केंद्र की मोदी सरकार नए कृषि कानून लेकर आयी. किसान इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं. हालांकि, दोनों के बीच अब प्रमुख मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का है. किसान कह रहे हैं कि उन्हें मोदी सरकार से एमएसपी की गारंटी चाहिए, सरकार ने भी कह दिया है कि वह एमएसपी पर लिखित आश्वासन देने को तैयार है. तो फिर अब समस्या क्या है? क्यों किसान अब भी पीछे हटने को तैयार नहीं हो रहे हैं?

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एमएसपी पर सरकार का कहना है कि वह इसकी मौजूदा व्यवस्था को खत्म नहीं करेगी और इसे पहले की तरह ही जारी रखेगी. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार नए कृषि कानून लागू होने के बाद भी पहले की तरह ही हर साल फसलों के समर्थन मूल्य का ऐलान करती रहेगी. दूसरी तरफ किसानों का कहना है कि उन्हें एमएसपी पर एक नयी व्यवस्था चाहिए. एमएसपी पर अब तक चली आ रही व्यवस्था में दिक्कत यह है कि केंद्र सरकार 23 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन उन सभी को खरीदती नहीं है. यहां तक कि वह जिन मुख्य फसलों – गेंहू और धान – को खरीद में तरजीह देती है, उनका भी करीब आधा हिस्सा ही खरीदती है.

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एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019-20 में देश में 1184 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ जिसमें से 511 लाख टन ही सरकार द्वारा खरीदा गया. इसी साल हुए 1076 लाख टन गेहूं में सरकारी खरीद की मात्रा 390 लाख टन थी. इसके अलावा 231 लाख टन दाल में से सिर्फ 28 लाख टन और 454 लाख टन मोटे अनाज जैसे ज्वार बाजरा आदि में से चार लाख टन की ही सरकारी खरीद हुई. यानी सरकार ने इन फसलों की कुल पैदावार का करीब 32 फीसदी हिस्सा ही खरीदा. ऐसा भी सिर्फ उन फसलों के मामले में किया गया जिन्हें सरकार खरीदती है. सरकार एमएसपी घोषित करने के बाद भी कुछ फसलें बिलकुल नहीं खरीदती. यही वजह है कि एमएसपी की मौजूदा व्यवस्था से गिने-चुने किसानों को ही फायदा मिलता है. केंद्र सरकार की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार की एमएसपी पर खरीद का फायदा देश के केवल छह फीसदी किसानों को ही मिलता है. किसान अब चाहते हैं कि सरकार इसकी एक नयी व्यवस्था लाकर उनकी परेशानी को दूर करे.

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केंद्र सरकार हर साल अपने फसल खरीद लक्ष्य को संशोधित करती है. वह हर साल यह तय करती है कि उसे किसानों से कितना अनाज खरीदना है. इससे ही यह भी तय होता है कि उसे एमएसपी पर प्रत्येक किसान से अधिकतम कितना अनाज खरीदना है. कुल मिलाकर कहें तो किसान चाहें कितना ही अनाज पैदा करें लेकिन सरकार उनसे एक निश्चित मात्रा से ज्यादा अनाज नहीं खरीदती है. बाकी बची फसल को किसान बाहर बेचता है. अब नए कानून के बाद किसानों को यह डर है कि अगर भविष्य में सरकार ने फसल की खरीद का बहुत कम लक्ष्य निर्धारित किया तो उसे बहुत बड़ी मात्रा में अपनी फसल बाहर बेचनी पड़ेगी. तब अगर प्राइवेट कंपनियां उनकी फसल ओने-पौने दामों पर खरीदने लगीं तो वे क्या करेंगे?

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पंजाब और हरियाणा के किसान नए कानून को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं. अभी सरकार एमएसपी पर सबसे ज्यादा अनाज इन्हीं राज्यों से खरीदती है. नीति आयोग की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में सौ फीसदी किसान फसल को एमएसपी पर बेचते हैं. यही वजह है कि इन दो राज्यों के किसान कड़ाके की ठंड में भी नये कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि एमएसपी पर किसान चाहते क्या हैं? किसानों का कहना है कि सरकार ऐसा कानून बनाए कि अगर उनकी फसल को कोई व्यापारी या कोई प्राइवेट कंपनी खरीदे तो वह उसे एमएसपी पर या उससे ज्यादा कीमत पर ही खरीदे. यानी एक ऐसा कानून जिसके चलते कोई भी फसल को एमएसपी से नीचे खरीद ही न पाए. लेकिन मोदी सरकार किसानों की इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है.

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