ज्ञानकारी | सेना

सेना को सेहत का घूंट देने वाले मिलिट्री फार्म्स को बंद क्यों कर दिया गया है?

एक समय था जब भारत में सबसे ज्यादा पशु मिलिट्री फार्म्स के पास ही हुआ करते थे

ब्यूरो | 03 अप्रैल 2021 | प्रतीकात्मक तस्वीर

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मिलिट्री फार्म्स का इतिहास और योगदान

देश में पहला मिलिट्री फार्म एक फरवरी 1889 को इलाहाबाद में खोला गया था. इसका मकसद छावनियों में रह रहे और मोर्चों पर तैनात सैनिकों को दूध और मक्खन की आपूर्ति करना था. धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार ने देश के सभी हिस्सों में ऐसे फार्म्स की स्थापना की. आजादी के बाद इनकी संख्या 100 से भी ज्यादा हो गई थी. इनमें चारे का भी उत्पादन होता था जिसे सेना की पशु परिवहन इकाई को भेजा जाता था. एक वक्त था जब देश में सबसे ज्यादा पशु मिलिट्री फार्म्स में ही होते थे. 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में इन फार्म्स ने पश्चिमी और पूर्वी मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों के लिए दूध की आपूर्ति की थी. कारगिल की लड़ाई के दौरान भी इन्होंने अपनी सेवाएं दीं.

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प्रोजेक्ट फ्रीजवाल: मिलिट्री फार्म्स की अहम उपलब्धि

धीरे-धीरे मिलिट्री फार्म्स को कृत्रिम गर्भाधान के जरिये पशुओं की नस्ल सुधारने के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा. इस सिलसिले में प्रोजेक्ट फ्रीजवाल का जिक्र खास तौर पर किया जा सकता है जो 1987 में शुरू हुआ था. यह गायों की वर्णसंकर प्रजाति विकसित करने यानी क्रॉसब्रीडिंग के लिहाज से दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक था. इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की भी भागीदारी थी. प्रोजेक्ट फ्रीजवाल का लक्ष्य गायों की ऐसी नस्ल विकसित करना था जो यूरोप की गायों की तरह ज्यादा दूध देने वाली हो और भारत की गर्म जलवायु को भी सहन कर सके. इसके तहत यूरोप की होल्स्टाइन फ्रीजियन नस्ल का भारत की साहीवाल नस्ल के साथ मेल कराया गया. इसका नतीजा फ्रीजवाल नस्ल के रूप में आया. इस नस्ल की गाय एक दिन में 20-22 लीटर दूध देती है जो सामान्य देसी गाय से तीन से चार गुना ज्यादा है.

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मिलिट्री फार्म्स को बंद करने का फैसला क्यों हुआ?

आज भारत का डेयरी उद्योग काफी विकसित हो चुका है. दुनिया में दूध के उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 22 फीसदी है और इस मामले में वह पहले पायदान पर है. इसका मतलब यह है कि अब देश में कहीं भी किसी भी समय ताजा दूध मिल सकता है और इसके लिए सेना को मिलिट्री फार्म्स पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है. यह वजह है कि काफी समय से इस संस्था को बंद करने की जरूरत महसूस की जा रही थी. 2013 में फैसला हुआ कि मिलिट्री फार्म्स को धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया जाएगा. यानी यह कवायद पिछले कुछ समय से जारी थी. 31 मार्च 2021 को नई दिल्ली में एक औपचारिक आयोजन में इस संस्था का झंडा स्थायी रूप से झुका दिया गया. इस तरह 132 साल बाद इसका गौरवशाली सफर खत्म हो गया.

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मिलिट्री फार्म्स के पशुओं का क्या हुआ?

मई 2018 में रक्षा मंत्रालय ने चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ को निर्देश दिया था कि मिलिट्री फार्म्स में जो भी पशु हैं उन्हें केंद्र या राज्य के डेयरी विभागों या फिर कोऑपरेटिव इकाइयों को 1000 रु प्रति पशु के हिसाब से बेच दिया जाए. तब फ्रीजवाल नस्ल की एक गाय की बाजार में कीमत करीब एक लाख रु थी. अलग-अलग राज्यों ने इन गायों के लिए अलग-अलग योजनाएं बनाईं. मसलन उत्तराखंड सरकार ने फैसला किया कि ये गायें 1000 रु की नाममात्र कीमत पर दुग्ध विकास समिति से जुड़े पशुपालकों को दे दी जाएं. शर्त यह थी कि डेयरी किसान इन गायों का दूध राज्य के दुग्ध विकास विभाग को ही बेचेंगे. इस तरह 39 मिलिट्री फार्म्स में मौजूद करीब 25 हजार पशुओं को अलग-अलग जगहों पर भेज दिया गया.

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मिलिट्री फार्म्स की जमीन और स्टाफ का क्या होगा?

मिलिट्री फार्म्स से जुड़े 1000 से ज्यादा स्थायी स्टाफ को अब रक्षा मंत्रालय के दूसरे विभागों में ट्रांसफर कर दिया गया है. इनमें से ज्यादातर सिविलियन कर्मचारी थे. वैसे भी काफी समय से इस विभाग में कोई नई स्थायी नियुक्ति नहीं की गई थी और अस्थायी भर्तियों से काम चलाया जा रहा था. बताया जा रहा है कि इन फार्म्स को बंद करने के फैसले से सरकार को हर साल करीब पौने तीन सौ करोड़ रु की बचत होगी. मिलिट्री फार्म्स के पास देश भर में अलग-अलग जगहों पर कुल मिलाकर करीब 20 हजार एकड़ जमीन थी. इसके इस्तेमाल पर रक्षा मंत्रालय ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है.

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