कोविड-19 वैक्सीन

ज्ञानकारी | स्वास्थ्य

आम तौर पर सालों में तैयार होने वाली वैक्सीन्स कोविड-19 के मामले में इतनी जल्दी कैसे बन गईं?

कोविड-19 के लिए जल्द से जल्द वैक्सीन बनाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती थी कि जरूरी प्रक्रियाओं के साथ कोई समझौता न हो

ब्यूरो | 28 दिसंबर 2020 | फोटो: पिक्साबे

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कोविड-19 संकट से काफी पहले ही वैज्ञानिक समुदाय को आशंका थी कि भविष्य में इस तरह की कोई महामारी आ सकती है. इसलिए संभावित परिस्थितियों से निपटने की एक कार्ययोजना पहले ही तैयार थी. सरकारें, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और विभिन्न संगठन इसके मद्देनजर अपने संसाधन साझा कर रहे थे. 2017 में ही भविष्य की महामारियों से निपटने की दिशा में नवाचार के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (सीईपीआई) बन चुका था. मॉडर्ना जैसी कई फार्मा कंपनियां और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे चर्चित संस्थान भी वैक्सीनों की नई तकनीकों पर काम कर रहे थे. यानी कोविड-19 के आने से पहले ही उससे निपटने की तैयारियां काफी आगे बढ़ चुकी थीं. संक्रमण की शुरुआत में ही चीन ने इस वायरस को पहचान कर इससे जुड़ी तमाम जानकारियां सबके साथ साझा कर दीं. इनमें सबसे अहम थी कोरोना वायरस के आरएनए का जेनेटिक सीक्वेंस. इसने एमआरएनए वैक्सीन के जल्द आने का रास्ता साफ कर दिया.

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वैक्सीन विकसित करना बहुत खर्चीला काम है. हो सकता है कि आप कई साल तक एक दिशा में बढ़ते रहें और किसी चरण में मनचाहे नतीजे न मिलने पर आपको फिर शुरुआती बिंदु पर लौटना पड़े. यही वजह है कि इस काम के लिए फंडिंग का बंदोबस्त करने में वक्त लगता है. अगर आप शोधकर्ता हैं तो आपको अनुदान देने वाली संस्थाओं को यकीन दिलाना पड़ता है कि आपकी दिशा सही है. अगर कोई वैक्सीन कंपनी यह काम करना चाहती है तो उसे अपने निदेशकों और बाहर से फंड देने वालों को विश्वास में लेना पड़ता है. कोविड-19 के मामले में एक-एक दिन बहुत कीमती था. इसलिए वैक्सीन विकसित करने वालों को तुरंत और काफी फंड मिल गया.

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फंडिंग के बाद अगला चरण क्लीनिकल ट्रायल्स का होता है. यहां पर भी मामला तुरत-फुरत आगे बढ़ा. यह काम आम तौर पर धीरे-धीरे होता है क्योंकि अलग-अलग समितियों और नियामकों के पास ऐसे ट्रायल्स के प्रस्तावों का बड़ा ढेर होता है. लेकिन कोविड-19 के मामले में आवेदन मिलते ही प्राथमिकता के आधार पर उन्हें अलग किया गया और अक्सर 24 घंटे के भीतर ही फैसले ले लिए गए. इसके तुरंत बाद ट्रायल्स शुरू कर दिए गए. ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित की गई वैक्सीन के पहले चरण के ट्रायल्स के लिए चार केंद्र पहले से ही तैयार थे. ट्रायल्स तेजी से इसलिए भी हो सके कि इनके लिए स्वेच्छा से आवेदन करने वालों की एक बड़ी संख्या मौजूद थी. आम तौर पर नई वैक्सीन के ट्रायल्स में इसलिए भी महीनों लग जाते हैं क्योंकि इनके लिए लोग बड़ी मुश्किल से मिलते हैं.

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संयोग से यह भी अच्छी बात रही कि ट्रायल्स के क्षेत्र में डेटा संकलन की प्रक्रिया को ऑनलाइन शिफ्ट करने की प्रक्रिया पर बीते कुछ साल से काम चल ही रहा था. इससे ही यह संभव हो सका कि एक तरफ जानकारियां आती गईं और दूसरी तरफ तुरंत ही उनका विश्लेषण भी शुरू हो गया. कागजी तरीके से इस काम में बहुत समय लग जाता था. इसके अलावा इससे डेटा में चूक की संभावना भी पहले के मुकाबले काफी कम हो गई. बीते अक्टूबर के बाद कोविड-19 के संक्रमण में आई तेजी ने भी शोधकर्ताओं की मदद की. असल में संक्रमण में कमी होना बाकियों के लिए भले ही अच्छी खबर हो, लेकिन वैक्सीन विकसित करने वालों के लिए यह बुरी खबर होती है. इससे वैक्सीन के असर का सटीक आकलन करना मुश्किल हो जाता है.

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आम तौर पर जब ट्रायल्स खत्म हो जाते हैं और उनसे जुड़ी सभी जानकारियों का विश्लेषण कर लिया जाता है तब डेटा का यह विशाल भंडार एक साथ संबंधित नियामकों को भेजा जाता है जिसकी वे समीक्षा करते हैं. सामान्य हालात में इसमें कई महीने लग जाते हैं. लेकिन कोविड-19 की वैक्सीन के मामले में यह डेटा सिलसिलेवार तरीके से नियामकों को भेजा गया. यानी जब तक क्लीनिकल ट्रायल्स से जुड़े आखिरी नतीजे आए तब तक नियामकों द्वारा पिछले सभी नतीजों की समीक्षा की जा चुकी थी. यही नहीं, कंपनियों ने वैक्सीन का अग्रिम उत्पादन भी शुरू कर दिया था. यह कारोबार के लिहाज से एक बड़ा जोखिम था. उत्पादन तभी शुरू किया जाता है जब सारी जरूरी मंजूरियां मिल जाएं. अगर नियामक अपनी समीक्षा में संतुष्ट नहीं होते तो उत्पादन रोककर सारा स्टॉक नष्ट करना पड़ता. लेकिन सौभाग्य से अब तक बन चुके टीकों के मामले में ऐसा नहीं हुआ.

(द गार्डियन के इस लेख पर आधारित)

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