कोरोना वायरस वैक्सीन

ज्ञानकारी | स्वास्थ्य

क्या कोरोना वायरस के मामले में वैक्सीन से बेहतर विकल्प ‘नैचुरल इम्यूनिटी’ है?

कोरोना वायरस की कई वैक्सीन्स बाज़ार में आने ही वाली हैं लेकिन साथ-साथ यह बहस भी गर्म हो रही है कि इनकी जरूरत है भी या नहीं

ब्यूरो | 07 दिसंबर 2020 | फोटो: पिक्साबे

1

अमेरिकी सीनेटर रैंड पॉल का एक ट्वीट बीते दिनों काफी चर्चा में रहा. इस ट्वीट में उनका कहना था कि कोरोना वायरस के लिए नैचुरल इम्यूनिटी यानी एक बार संक्रमण हो जाने पर शरीर में अपने आप विकसित हुई प्रतिरोधक क्षमता, वैक्सीन से बेहतर विकल्प है. रैंड पॉल उन लोगों में से हैं जिन्हें कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है. बीते कुछ समय के दौरान उन समेत कई लोग हैं जिनका कहना है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन से ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी उपाय यह है कि इस संक्रमण को होने दिया जाए.

2

ऐसे बहुत से वायरस हैं जिनका प्राकृतिक रूप से संक्रमण उन्हें रोकने के लिए बनी वैक्सीन की तुलना में ज्यादा प्रभावी माना जाता है. मसलन किसी को गलसुआ या मंप्स (थूक और लार बनाने वाली ग्रंथि की सूजन) अगर अपने आप ही हो जाए तो उसे फिर जीवन भर के लिए इस बीमारी से इम्यूनिटी मिल जाती है. दूसरी तरफ, ऐसे भी मामले देखे गए हैं कि वैक्सीन लगने के बावजूद लोगों को गलसुआ हो गया. खसरा भी एक ऐसी ही बीमारी है जिसका संक्रमण एक बार होने के बाद उससे जीवन भर के लिए सुरक्षा मिल जाती है.

3

कोरोना वायरस के बारे में भी वैज्ञानिक अब तक जितना जान सके हैं उससे यह तो पता लग ही गया है कि एक बार इसका संक्रमण हो जाने पर इससे मिलने वाली इम्यूनिटी खासी मजबूत होती है. कई जानकारों के मुताबिक संक्रमित होकर उबर चुके लोगों में से ज्यादातर में कम से कम कम इतनी एंटीबॉडीज तो विकसित हो ही जाती हैं कि उन्हें कुछ समय के लिए इस बीमारी से सुरक्षा मिल जाती है. ऐसे लोगों को अगर दोबारा संक्रमण होता भी है तो वह ज्यादा गंभीर और खतरनाक नहीं होता. कई मामलों में सुरक्षा का यह दायरा सालों तक जा सकता है.

4

वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि कोरोना वायरस के मामले में नैचुरल इम्यूनिटी की बात करना सही नहीं है. इन वैज्ञानिकों का कहना है कि अब भी 100 फीसदी यकीन के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि किसके लिए यह संक्रमण जानलेवा नहीं होगा. यही वजह है कि एक साक्षात्कार में यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में इम्यूनॉलॉजिस्ट जेनिफर गोम्मरमन कहती हैं, ‘वैक्सीन के बजाय बीमारी चुनना बहुत ही गलत फैसला है.’ वैक्सीन के समर्थन में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि नेचुरल इम्यूनिटी की भी एक समयसीमा तो है ही, इसलिए ऐसे लोगों के लिए भी एक समय के बाद वैक्सीन जरूरी होगी. वैज्ञानिक शब्दावली में इसे बूस्टर डोज कहा जाता है.

5

नेचुरल इम्यूनिटी के बजाय वैक्सीन के पक्ष में एक और तर्क है. जानकारों के मुताबिक कोरोना वायरस से मुक्त होने के बाद भी कई लोगों को उस नुकसान से उबरने में वक्त लगता है जो संक्रमण के चलते शरीर को होता है. ऐसे भी मामले देखे गए हैं जब उबर चुके लोगों में रयूमेटॉएड अर्थराइटिस जैसी बीमारियां पैदा हो गईं. यानी वायरस ने रोग प्रतिरोधक क्षमता पर कुछ ऐसा असर छोड़ा कि वह शरीर के खिलाफ ही काम करने लगी. इसलिए कई जानकार वैक्सीन को बेहतर विकल्प बताते हैं जिसमें इस तरह के जोखिम नहीं होते क्योंकि उसे सुरक्षा की पूरी आश्वस्ति के बाद ही मंजूरी दी जाती है.

(द न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख पर आधारित)

  • न्यायपालिका

    विचार-रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश

    क्यों इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये फैसले उत्तर प्रदेश में एनएसए के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाते हैं

    ब्यूरो | 08 अप्रैल 2021

    अगर विकल्प मिले तो कोवीशील्ड और कोवैक्सिन में से किसे चुनना ज्यादा सही होगा?

    खरा-खोटा | कंपैरिज़न

    अगर विकल्प मिले तो कोवीशील्ड और कोवैक्सिन में से किसे चुनना ज्यादा सही होगा?

    अंजलि मिश्रा | 08 अप्रैल 2021

    सेना को सेहत का घूंट देने वाले मिलिट्री फार्म्स को बंद क्यों कर दिया गया है?

    ज्ञानकारी | सेना

    सेना को सेहत का घूंट देने वाले मिलिट्री फार्म्स को बंद क्यों कर दिया गया है?

    ब्यूरो | 03 अप्रैल 2021

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

    विचार-रिपोर्ट | राजनीति

    क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे का सबसे बड़ा मकसद पश्चिम बंगाल का चुनाव है?

    ब्यूरो | 27 मार्च 2021