कोरोना वायरस वैक्सीन

ज्ञानकारी | स्वास्थ्य

कोरोना वायरस के एमआरएनए वैक्सीन में ऐसा क्या है जो बाकियों में नहीं है?

कोरोना वायरस के खिलाफ फाइजर और मॉडर्ना की एमआरएनए वैक्सीनों की काफी चर्चा हो रही है

ब्यूरो | 23 नवंबर 2020 | फोटो: पिक्साबे

1

एमआरएनए वैक्सीन को लेकर इतना उत्साह क्यों है?

करीब तीन दशक से वैक्सीन शोधकर्ता एमआरएनए तकनीक से उम्मीदें बांधते और आखिर में निराश होते रहे हैं. लेकिन इस बार ये उम्मीदें पूरी होती दिख रही हैं. चर्चित फार्मा कंपनियों फाइजर और मॉडर्ना का दावा है कि कोरोना वायरस के खिलाफ तैयार की गई उनकी एमआरएनए वैक्सीन असाधारण रूप से कारगर रही हैं. फाइजर के मामले में यह आंकड़ा 90 फीसदी है जबकि मॉर्डना की वैक्सीन 94.5 फीसदी तक असरदार रही. दोनों कंपनियों ने यह दावा फेज-3 ट्रायल के बाद किया है. इस चरण में लोगों की एक बड़ी संख्या पर वैक्सीन का परीक्षण किया जाता है. फाइजर ने यह परीक्षण 43,538 लोगों पर किया जबकि मॉडर्ना के मामले में यह आंकड़ा 30 हजार था.

2

एमआरएनए वैक्सीन कैसे काम करती है?

आम तौर पर वैक्सीन में वायरस का ही निष्क्रिय स्वरूप या फिर उसका वह खास प्रोटीन होता है जिसकी मदद से वायरस हमारे शरीर की किसी कोशिका से जुड़कर उसे संक्रमित करता है. इसलिए जब यह वैक्सीन हमें लगाई जाती है तो वायरस या उससे जुड़े प्रोटीन को पहचानते ही शरीर का इम्यून सिस्टम सचेत हो जाता है और इसकी प्रतिक्रिया में एंटीबॉडीज यानी वायरस से लड़ने वाले खास प्रोटीन बना देता है. नतीजा यह होता है कि जब असल वायरस हम पर हमला करता है तो शरीर में पहले से ही मौजूद ये एंटीबॉडीज उसे घेर कर उसका खात्मा कर देते हैं. एमआरएनए वैक्सीन अब तक प्रचलित वैक्सीनों से इस मायने में अलग है कि इसमें कोरोना वायरस के जेनेटिक मटीरियल (आनुवंशिक सामग्री) का एक खास हिस्सा होता है. इसे मैसेंजर आरएनए या एमआरएनए कहते हैं. शरीर में दाखिल होने पर यह एमआरएनए हमारी ही कोशिकाओं को वायरस वाला वह प्रोटीन बनाने का निर्देश देने लगता है जिसकी मदद से असली कोरोना वायरस हम पर हमला बोलता है. नतीजतन हमारा इम्यून सिस्टम सचेत हो जाता है और एंटीबॉडीज बनाने लगता है.

3

दूसरी वैक्सीनों की तुलना में एमआरएनए वैक्सीन का क्या फायदा है?

वैक्सीन बनाने के पारंपरिक तरीके बहुत समय लेते हैं. शोध की शुरुआत से लेकर विभिन्न परीक्षणों और आखिर में नियामक से स्वीकृति तक यह अवधि कई साल की हो सकती है. तब तक महामारियां व्यापक विनाश का कारण बन सकती हैं जैसा कि हम अभी कोविड-19 के मामले में देख रहे हैं. एमआरएनए वैक्सीन का सबसे बड़ा फायदा यही है कि इसे बहुत कम समय में विकसित किया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि वायरस का निष्क्रिय स्वरूप या फिर उससे जुड़ा प्रोटीन विकसित करने में काफी वक्त लगता है. एमआरएनए वैक्सीन के निर्माण में ऐसा करने की जरूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि इसमें जोर शरीर को ही वायरस से जुड़े प्रोटीन बनाने के लिए उत्प्रेरित करने पर होता है. एमआरएनए की संरचना वायरल प्रोटीन के मुकाबले कहीं कम जटिल होती है इसलिए इसे बनाने और इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन में भी ज्यादा समय नहीं लगता. कम जटिल होने के चलते इसे भविष्य में दूसरी महामारियों के लिए भी बहुत कम समय में रि-डिजाइन किया जा सकता है.

4

अब तक एमआरएनए वैक्सीन को बनाने में क्या दिक्कतें आ रही थीं?

जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ, एमआरएनए से वैक्सीन बनाने की कोशिशें काफी पहले से हो रही हैं. लेकिन समस्या यह थी कि एक तो एमआरएनए बहुत ही अस्थिर प्रकृति का होता है जिसके चलते यह बहुत आसानी से दूसरे स्वरूपों में विभाजित हो जाता है. दूसरी बात यह है कि मानव शरीर का इम्यून सिस्टम इसे बहुत जल्दी पहचानकर खत्म कर देता है जिसके चलते इसे इच्छित लक्ष्य तक पहुंचा पाना टेढ़ी खीर हो जाता है. कुछ समय पहले ही वैज्ञानिकों ने एमआरएनए को स्थिर बनाने और इसे कुछ सूक्ष्म कणों के भीतर पैक करके शरीर में भेजने का एक तरीका खोजा था. इससे वैक्सीन बनाने की राह में खड़ी एक बड़ी बाधा दूर हो गई.

5

तो अब इंतजार किस बात का है?

फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीनों के फेज-3 ट्रायल के बाद अगर सब कुछ ठीक रहा तो एमआरएनए कोविड-19 वैक्सीन अपनी तरह की पहली (एमआरएनए) वैक्सीन होगी. इसने परीक्षणों में तो उत्साहजनक नतीजे दिए हैं, लेकिन अभी इन परीक्षणों से जुड़ी पूरी जानकारियां सामने नहीं आई हैं. मसलन अभी यह पता नहीं है कि जिन लोगों को यह वैक्सीन दी गई उन पर कोई दूसरे हानिकारक प्रभाव तो नहीं पड़े. अभी यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि एमआरएनए वैक्सीन से कितने समय तक कोरोना वायरस से सुरक्षा मिल सकती है. इसके अलावा इस बारे में भी पूरी जानकारी नहीं है कि क्या यह वैक्सीन हर उम्र या नस्ल के लोगों पर उतनी ही असरदार है या नहीं. इन तमाम जानकारियों की पुष्टि होने के बाद ही यूएस-एफडीए और दूसरे नियामक वैक्सीन को मंजूरी देंगे और तभी इसकी आगे की राह साफ हो सकेगी. इसके अलावा एक चुनौती यह भी है कि इस तरह की वैक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए इसे बहुत ही कम तापमान में रखना होता है. उदाहरण के लिए फाइजर की वैक्सीन को -70 डिग्री तापमान पर रखना होगा. नॉर्मल रेफ्रिजेरेशन यानी किसी घरेलू फ्रिज में वह पांच दिन में खराब हो जाएगी. फैक्ट्री से लेकर सुदूर किसी गांव तक इस असाधारण कोल्ड चेन को मेंटेन करना बहुत ही दुष्कर काम है. हालांकि, मॉडर्ना का दावा है कि उसकी एमआरएनए वैक्सीन घरों के फ्रीजर में भी छह महीने तक स्टोर की जा सकती है. लेकिन इस दावे का भी अभी जमीन पर सही साबित होना बाकी है.

(द कनवर्जेशन के इस लेख पर आधारित)

  • रियलमी नार्ज़ो 30 5जी मोबाइल फोन

    खरा-खोटा | मोबाइल फोन

    रियलमी नार्ज़ो 30 (5जी): मनोरंजन के लिए मुफीद एक मोबाइल फोन जो जेब पर भी वजन नहीं डालता है

    ब्यूरो | 03 जुलाई 2021

    ह्यूंदेई एल्कजार

    खरा-खोटा | ऑटोमोबाइल

    क्या एल्कजार भारत में ह्यूंदेई को वह कामयाबी दे पाएगी जिसका इंतजार उसे ढाई दशक से है?

    ब्यूरो | 19 जून 2021

    वाट्सएप

    ज्ञानकारी | सोशल मीडिया

    ‘ट्रेसेबिलिटी’ क्या है और इससे वाट्सएप यूजर्स पर क्या फर्क पड़ेगा?

    ब्यूरो | 03 जून 2021

    कोविड 19 की वजह से मरने वाले लोगों की चिताएं

    आंकड़न | कोरोना वायरस

    भारत में अब तक कोरोना वायरस की वजह से कितने लोगों की मृत्यु हुई होगी?

    ब्यूरो | 27 मई 2021