चॉकलेट्स और कॉफी

ज्ञानकारी | पर्यावरण

जलवायु परिवर्तन खाने-पीने की इन पांच चीजों को भी खत्म कर सकता है!

जलवायु परिवर्तन के कारण कई तरह की फसलों, जानवरों और मछलियों को उपयुक्त मौसम नहीं मिल पा रहा है जिसके चलते उनके अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया है

ब्यूरो | 27 जुलाई 2019 | फोटो: पिक्साबे

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चाय-कॉफी

बताया जाता है कि आने वाले 30 सालों में यानी 2050 तक धरती का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि कॉफी उगाने के लिए ठीक माने जाने वाले इलाके आधे ही रह जाएंगे. इसके अलावा 2080 तक कॉफी की कई जंगली किस्मों के खत्म हो जाने का खतरा भी जताया जा रहा है. इसका एक उदाहरण तंजानिया है, जो कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक है लेकिन बीते पचास सालों में यहां कॉफी का उत्पादन घटकर आधा रह गया है. कॉफी का विकल्प चाय भी ऐसी ही मुश्किलों में घिरा नज़र आता है. कुछ समय पहले भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा था कि चाय के बागानों के लिए मॉनसून का अच्छा होना जरूरी है लेकिन बीते कुछ सालों से ज्यादा बारिश चलते चाय का स्वाद फीका पड़ता जा रहा है.

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चॉकलेट

चॉकलेट, कोको से बनती है. कोको की फलियों को भी सही तरह से विकसित होने के लिए कॉफी जैसी ही परिस्थितियों की जरूरत होती है. लेकिन कोको, कॉफी की तुलना में तापमान, मिट्टी, बारिश, धूप या हवा की रफ्तार के लिए ज्यादा संवेदनशील होता है. बदलती परिस्थितियों में उत्पादन में कमी आने के चलते इंडोनेशिया औऱ अफ्रीका के कोको उत्पादकों ने अब ताड़ या रबर के पेड़ लगाने शुरू कर दिए हैं. ऐसा अनुमान किया जाता है कि दुनिया में कोको की दो तिहाई मांग पूरा करने वाले देश घाना और आइवरी कोस्ट का औसत तापमान भी अगले 40 सालों में तकरीबन दो डिग्री तक बढ़ जाएगा. निश्चित ही इससे चॉकलेट उत्पादन पर खतरा बढ़ेगा.

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मछली

जलवायु निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाने वाले समुद्र और महासागर भी ग्लोबल वार्मिंग के असर से नहीं बच पाए हैं. इनका तापमान लगातार बढ़ने के चलते पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है जिसका असर यह हुआ है कि मछलियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पा रही हैं और उनका आकार छोटा होता जा रहा है. इसके अलावा, कॉर्बनडाइआक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण महासागरों का पानी अब अम्लीय होता जा रहा है. नतीजतन, शेलफिश जैसे खोल में पलने वाले जीवों पर खतरा पैदा हो गया है. ग्लोबल वार्मिंग के बुरे असर का एक उदाहरण यह भी है कि बीते कुछ सालों में मछलियों के उत्पादन में 5 फीसदी तक कमी आई है.

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आलू

जमीन के भीतर उगने वाला आलू भी लगातार सूखे का शिकार हो रहा है. ब्रिटिश मीडिया में आई कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि साल 2018 में आलू की पैदावार लगभग 25 फीसदी कम हो गई है. इसके साथ ही आलुओं के करीब तीन सेंटीमीटर तक छोटा हो जाने की बात भी कही जा रही है. सोचने वाली बात यह है कि अगर ब्रिटेन जैसे ठंडे देश में आलुओं पर ग्लोबल वार्मिंग का यह असर है तो भारत जैसे गर्म जलवायु देश में इसका क्या असर हो रहा होगा.

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शराब

मौसम के जानकार बताते हैं कि बढ़ती गर्मी के चलते शराब की कुछ किस्मों का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है. उदाहरण के लिए, कुछ समय पहले स्कॉटलैंड की प्रसिद्ध व्हिस्की की कई फैक्ट्रियां बंद हो गईं क्योंकि उन्हें व्हिस्की बनाने के लिए ताजा पानी नहीं मिल पा रहा था. इसी तरह फ्रांस में करीब छह सदी पुरानी ब्रैंडी की एक किस्म कॉन्यैक को बनाने में इसलिए मुश्किलें आ रही हैं कि इसके मुख्य घटक अंगूर की मिठास बहुत बढ़ गई है. बताया जाता है कि अंगूरों की मिठास बढ़ने के पीछे भी ग्लोबल वार्मिंग का हाथ है. इस समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक उपायों पर शोध कर करोड़ों खर्च किए जा चुके हैं लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है.

बीबीसी की रिपोर्ट पर आधारित.

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