नक्काश में इनामुलहक

मनोरंजन | सिनेमा

नक्काश: बदलते हुए वक्त में इंसानियत के करीब जाने का मशविरा देती एक फिल्म

कलाकार: कुमुद मिश्रा, इनामुलहक, शरीब हाशमी, पवन तिवारी | लेखक-निर्देशक: ज़ैग़म इमाम | रेटिंग: 2.5/5

ब्यूरो | 31 जून 2019

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ज़ैग़म इमाम की ‘नक्काश’ बनारस और हिंदू-मुस्लिम समीकरणों पर बनी उनकी तरह की तीसरी फिल्म है. उनकी तरह की इसलिए कि वे इससे पहले भी बनारस और धर्म पर ‘दोज़ख़ – इन सर्च ऑफ हैवेन’ और ‘अलिफ’ जैसी दो खूबसूरत और बेहद सराही गई फिल्में बना चुके हैं.

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ज़ैग़म इमाम की पिछली दो फिल्में जहां दो कौमों के बीच हमेशा मौजूद रहने वाले तनाव की बात करती हैं. वहीं तीसरी फिल्म नक्काश बार-बार बदले हुए वक्त की बात कहती है. वह बार-बार यह संवाद दोहराती रहती है कि ‘अब चीजें बदल चुकी हैं.’

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फिल्म की कहानी पर आएं तो यह बनारस के एक पुजारी, वेदांती और उसके मंदिर में काम करने वाले नक्काश, अल्ला रक्खा का किस्सा दिखाती है. अल्ला रक्खा की कई पीढ़ियां मंदिरों और उनके देवताओं को सजाती संवारती रही हैं. नक्काश अल्लाह रक्खा को अपनी कला पर जितना गर्व है, उतना ही भरोसा वेदांती को उस पर और अपनी धार्मिक सद्भावनाओं पर है. राजनीति इस सुंदर ताने-बाने पर कैसे ग्रहण लगाती है, फिल्म यही दिखाती है.

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वेदांती की भूमिका में कुमुद मिश्रा ने नक्काश में प्रसन्न करने वाला अभिनय किया है. उन्माद के कारण बनारस और अपने धर्म की खोती हुई गरिमा पर उनका कोफ्त जताना देखने लायक है. अल्लाह रक्खा बने इमानुल्लाहक के हिस्से में ज्यादातर वक्त मेलोड्रामा ही आता है. लेकिन फिर भी फिल्म में वे दहशत और बेचारगी को चेहरा देने में भली तरह से सफल होते हैं.

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फिल्म का सेंट्रल आइडिया देश में बढ़ता साम्प्रदायिक तनाव है. और नक्काश इस बेहद संवेदनशील विषय पर बनी कुछ अच्छी फिल्मों में गिनी जा सकती है. कुछ तकनीकी खामियां और कुमुद मिश्रा के अलावा बाकी कलाकारों का अपेक्षाकृत कमजोर अभिनय इसे थोड़ा कमजोर तो करता है लेकिन अंत में फिल्म जो मार्मिक संदेश देती है, वो आपका दिल छू जाता है.

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