खानदानी शफाखाना में सोनाक्षी सिन्हा और वरुण शर्मा

मनोरंजन | सिनेमा

खानदानी शफाखाना: एक बेहतरीन आइडिया को बरबाद करने वाला बेअसर सिनेमा

कलाकार: सोनाक्षी सिन्हा, वरुण शर्मा, बादशाह, अन्नू कपूर | निर्देशक: शिल्पी दासगुप्ता | रेटिंग: 2/5

ब्यूरो | 02 अगस्त 2019

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हमारे यहां सेक्स क्लीनिक का जिक्र या तो व्यस्त चौराहों की दीवारों पर या फिर अश्लील कहे जाने वाले चुटकुलों में होता है. यहां तक कि खुद को ब्रॉड माइंडेड बताने वाले लोग भी इनका चक्कर लगाने वालों को तिरछी नज़र और रहस्यमयी मुस्कान के साथ देखते हैं. ऐसे में इस विषय पर बनी खानदानी शफाखाना के पास एक ढंग की और जरूरी बात कहने का बड़ा मौका था. लेकिन जैसा कि अक्सर बॉलीवुड फिल्मों के साथ होता है, यह भी ऊपर-ऊपर की बातों से काम चला लेने की कोशिश में बेअसर रह जाती है.

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कहानी की बात करें तो यह पंजाब के होशियारपुर शहर में रहने वाली बेबी बेदी की है जिसे विरासत में एक सेक्स क्लीनिक मिलता है. खुद पेशे से एमआर रही बेबी शुरूआत में इसे चलाने में हिचकती है. लेकिन कहानी के आगे बढ़ने के साथ वह लोगों को सेक्स पर बात करने के लिए जागरुक करती दिखती है. ये सब करते हुए फिल्म ढेर सारे मेलोड्रामा का सहारा लेती है और इसका विषय और कॉमेडी कहीं पीछे छूट जाते हैं.

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सोनाक्षी सिन्हा की बात करें तो अपनी देहबोली, चेहरे और मिजाज़ से वे बेबी बेदी के किरदार पर पूरी तरह फिट होती हैं. लेकिन अभिनय के मामले में हमेशा की तरह सीमित एक्स्प्रेशंस ही देती हैं. औऱ इन्हें इतनी बार दोहराती हैं कि थोड़ा बोर कर देती हैं. वहीं उनके भाई बने वरुण शर्मा को देखकर लगता है मानो उन्होंने खुद को फुकरे के चूचा वाले किरदार में कैद कर लिया और हर फिल्म में बस उसे ही जीते जा रहे हैं.

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फिल्म का एक्स फैक्टर घातक गबरू का किरदार निभा रहे बादशाह हैं जो पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर अभिनय करते हुए दिख रहे हैं. हालांकि गबरू, बादशाह का ही एक्सटेंशन है लेकिन इससे ज्यादा अभिनय वे अपने म्यूजिक वीडियोज में करते दिखते रहे हैं. इनके अलावा अन्नू कपूर, नादिरा बब्बर औऱ कुलभूषण खरबंदा अपनी भूमिकाओं में आपका ध्यान खींचते हैं.

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फिल्म के बाकी पहलुओ पर बात करें तो इसका संगीत एक तरफ तो है ऐसा है कि थिएटर से निकलने के बाद आपको याद ही नहीं रहता है कि इसमें गाने भी थे, दूसरी तरफ बैकग्राउंड म्यूजिक ऐसा है कि देर तक भेजा ठन-ठन करता है. संवाद ऐसे है कि सीन के हिसाब से कम-ज्यादा मेलोड्रामैटिक होते रहते हैं. प्रोडक्शन क्वालिटी ऐसी है कि आपको किरदारों के होशियारपुर में होने का यकीन बना रहता है. कुल मिलाकर, खानदानी शफाखाना में मनोरंजन का फुल डोज नहीं मिल पाता है. लेकिन इसके बाद भी पहली ही फिल्म में ऐसा विषय उठाने के लिए इसकी निर्देशक शिल्पी दासगुप्ता की तारीफ की जानी चाहिए.

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