आर्टिकल 15 में आयुष्मान खुराना

मनोरंजन | सिनेमा

आर्टिकल 15: सिनेमाई विनम्रता को छोड़, गैरबराबरी की वीभत्सताओं को सामने लाने वाली फिल्म

कलाकार: आयुष्मान खुराना, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सयानी गुप्ता | निर्देशक: अनुभव सिन्हा | लेखक: गौरव सोलंकी | रेटिंग: 3.5

ब्यूरो | 28 मई 2019

1

जाति विशेष की लड़कियां अपनी बात कह देने के लिए बलात्कार का शिकार हो जाती हैं. दलित दूल्हे घोड़ी पर चढ़ने के लिए पीट दिए जाते हैं. कथित निचजतिए मजदूर मजदूरी मांगने पर मारकर पेड़ पर लटका दिए जाते हैं. यह सब हमारे आसपास होता रहता है और हम अब इन खबरों को नजरअंदाज करने के आदी भी हो चले हैं. अनुभव सिन्हा निर्देशित आर्टिकल 15 ऐसी एक खबर के आने के पहले और बाद घटने वाले अनगिनत वाकये दिखाती है.

2

अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म ‘मुल्क’ ने जहां इस्लामोफोबिया पर बहुत सधे तरीके से बात की थी और खूब सारी तारीफ बटोरी थी. वहीं इस बार वे आर्टिकल 15 के जरिए जातिगत भेदभाव से जुड़ी कुछ ऐसी सच्चाइयां पेश करतें हैं जो आपकी नसों को झनझना देती हैं. फिल्म की कहानी जातिगत हिंसा के एक मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी की है. इस समझदार-संवेदनशील नायक के जरिए फिल्म दिखाती है कि कैसे हमें बराबरी का अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 15 की धज्जियां उड़ा दी गईं हैं. गौरव सोलंकी की लिखी यह पटकथा सिनेमाई विनम्रता को छोड़ गैरबराबरी की वीभत्सताओं को सामने लाती है.

3

कुछ दृश्य ऐसे हैं जिनमें किरदारों की बजाय कैमरा भी बहुत कुछ कहता दिखाई देता है. मसलन एक दृश्य में पेड़ पर लटकती लड़िकयों की लाशों पर पहुंचकर कैमरे का थरथराना, मानो उसकी भयावहता को अपनी संवेदनाएं दे देता है. इसके अलावा नाले की सफाई करता सफाईकर्मी या अपनी मूर्ति के कद में सिमटे हुए अंबेडकर भी आपसे बहुत कुछ कहते हैं. इन दृश्यों के लिए सिनेमैटोग्राफर एवान मलिगन की खूब-खूब तारीफ की जा सकती है.

4

अभिनय की बात करें तो आर्टिकल 15 में जातिगत हिसाब-किताब न समझने वाले पुलिस अधिकारी की भूमिका में आयुष्मान खुराना की सधी हुई चाल और एक्सप्रेशंस आपको खासा प्रभावित करते हैं. पुलिस की वर्दी पहनकर भी अपनी ऊंची जाति न छोड़ने वाले मनोज पाहवा और इसी वर्दी में अपनी नीची जाति को भी समेटे कुमुद मिश्रा अपने-अपने किरदारों की खासियतें पूरी तरह दिखाते हैं. साथ ही सयानी गुप्ता और मोहम्मद जीशान अय्यूब भी आपको याद रह जाने वाला काम करते हैं.

5

फिल्म में कुछ खामियां भी हैं मसलन कुछ सीन जबरन रखे गए लगते हैं और इनके चलते पहला हिस्सा जरूरत से ज्यादा लंबा हो गया है. साथ ही कई बार बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों की लिखाई पर हावी होता लगता है. इनके अलावा हीरो को हीरो दिखाने के लिए उसकी शर्ट उतरवाने जैसे टुच्चे प्रतीक फिल्म की गंभीरता को कम करते हैं. लेकिन इन सबके बावजूद आर्टिकल 15 अपनी बेबाकी के चलते एक जरूर देखी जाने वाली फिल्म बन जाती है.

  • शाओमी रेडमी के-20 प्रो

    खरा-खोटा | मोबाइल फोन

    शाओमी रेडमी के20 प्रो: एक ऐसा स्मार्टफोन जिसकी डिजाइन और कीमत सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं

    ब्यूरो | 08 सितंबर 2019

    ह्वावे लोगो

    विचार और रिपोर्ट | तकनीक

    अमेरिका की नीतियों से जूझ रहे ह्वावे को क्या उसका नया ऑपरेटिंग सिस्टम राहत दे सकता है?

    ब्यूरो | 05 सितंबर 2019

    महबूबा मुफ्ती

    समाचार | बुलेटिन

    महबूबा मुफ्ती की बेटी को उनसे मिलने की इजाजत दिए जाने सहित आज के बड़े समाचार

    ब्यूरो | 05 सितंबर 2019

    भारतीय उच्चायोग

    समाचार | बुलेटिन

    कश्मीर को लेकर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग पर पथराव होने सहित आज के बड़े समाचार

    ब्यूरो | 04 सितंबर 2019