द ताशकंद फाइल्स में पंकज त्रिपाठी और मिथुन चक्रबर्ती

मनोरंजन | सिनेमा

द ताशकंद फाइल्स: ऑल्टरनेटिव-हिस्ट्री का बासी पाठ पढ़ाती घोर प्रोपेगेंडा फिल्म

कलाकार: श्वेता बसु प्रसाद, मिथुन चक्रवर्ती, पंकज त्रिपाठी, नसीरुद्दीन शाह, मंदिरा बेदी, पल्लवी जोशी | लेखक-निर्देशक : विवेक अग्निहोत्री | रेटिंग : 1/5

ब्यूरो | 12 अप्रैल 2019

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निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ (2014) के वक्त से ही अपना लेफ्टिस्ट-फोबिया दुनियाभर को दिखा चुके हैं और उसके बाद से उनका ट्विटर अकांउट एंटी-लेफ्ट, एंटी-कांग्रेस और प्रो-बीजेपी पॉलिटिक्स का गवाह रहा है. ‘द ताशकंद फाइल्स’ उनकी इसी विचारधारा की उपज है और ऑल्टरनेटिव-हिस्ट्री रचने वाली प्योर प्रोपेगेंडा फिल्म है. केवल ऊपरी तौर पर यह भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत के रहस्य को सुलझाने की बात करती है.

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विवेक अग्निहोत्री उस दौर के फिल्म निर्देशक हैं जिसमें एक खास विचारधारा वाली राजनीति को खुश करने के लिए हिंदी सिनेमा को दांव पर लगाया जा रहा है. इसलिए उनकी फिल्म में आपको शास्त्री जी की मौत से जुड़ी तमाम कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज और वक्त के साथ उठते रहे वाजिब सवाल तो मिलेंगे, लेकिन जवाब केवल वही मिलेंगे जो आखिर में कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर सकें.

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फिल्म के एक हिस्से में सोवियत संघ की गुप्तचर संस्था केजीबी को शास्त्रीजी की हत्या से जोड़ा जाता है और एक केजीबी एजेंट की लिखी किताब को आधार बनाकर साबित किया जाता है कि उनकी हत्या के पीछे कौन रहा होगा. मजेदार है कि यह लंबा-चौड़ा विवरण देकर सीधे इंदिरा गांधी पर गंभीर आरोप लगाने के बाद, फिल्म छोटे अक्षरों में नीचे लिख देती है कि ‘इस रिपोर्ट में किए गए दावों की सत्यता साबित नहीं हुई है!’ बताईए! अब इससे ज्यादा शर्मनाक प्रोपेगेंडा और क्या होगा.

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अभिनय पर आएं तो श्वेता बसु प्रसाद फिल्म में पत्रकार बनी हैं  शुरुआत में तो उनका काम काफी प्रभावी है और बतौर हीरोइन वे खूब जंचती भी हैं. लेकिन जैसे-जैसे शास्त्री जी की मौत का सच जानने की सनक विस्तार लेती है, वैसे-वैसे उनके किरदार का पागलपन उनके अभिनय पर हावी हो जाता है. ऐसे वक्त में उन्हे परदे पर देखना बिलकुल नहीं सुहाता. बाकी सुदृढ़ एक्टरों की लंबी-चौड़ी कास्ट में से केवल मिथुन चक्रवर्ती असर छोड़ते हैं और ‘गुरु’ फिल्म के अपने किरदार की याद दिलाते हैं.

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विवेक अग्निहोत्री ने पहले से प्रचलित सवालों को लेकर और अपनी पसंद के लेखकों व उनकी किताबों से रेफरेंस लेकर वही सच गढ़ा है जो कि प्रो-बीजेपी विचारधारा वाले लेखक कई बरस से सार्वजनिक मंच पर कहते आ रहे हैं. फिल्म में जिन किताबों का जिक्र है उनमें से कुछ से अपनी सुविधा से तथ्य बनाए गए हैं और उन्हें सच माना गया है, बाकी को इस्तेमाल करने के बावजूद खारिज कर दिया गया है. ‘द ताशकंद फाइल्स’ को इसलिए देखिए कि पता चल सके कि खुद की विचारधारा को सर्वश्रेष्ठ बताने के लिए फिल्मकार ने कैसे चतुर तरीकों का उपयोग करते हैं.

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