सिम्बा, द लॉयन किंग

मनोरंजन | सिनेमा

द लॉयन किंग: डिज्नी की तरफ से दिया गया नॉस्टैल्जिया भरा एक और तोहफा

कलाकार: (वॉइस ओवर) शाहरुख खान, आर्यन खान, संजय मिश्रा, श्रेयस तलपड़े | निर्देशक: जॉन फेवरू | रेटिंग: 3.5/5

ब्यूरो | 19 जुलाई 2019

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पहले द जंगल बुक और अब द लायन किंग. इन फिल्मों को देखकर लगता है जैसे डिज्नी हमें उस वक्त के लिए तैयार कर रहा है जब क्लाइमेट चेंज के चलते दुनिया से जानवर और जंगल दोनों खत्म हो चुके होंगे. शायद उस वक्त हम केवल फिल्मों और तस्वीरों में ही इन्हें देख सकेंगे. द लॉयन किंग डिज्नी द्वारा ही 1994 में बनाई गई इसी नाम की एनिमेटेड फिल्म का रीमेक है. यह फिल्म हंसते, बोलते, गाते जानवरों वाली किसी वाइल्ड लाइफ डॉक्युमेंट्री को देखने सरीखा फील देती है.

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फिल्म की कहानी कुछ यूं है कि सिम्बा अपने पिता और लॉयन किंग मुफासा का उत्तराधिकारी है. शुरुआत में घटी कुछ घटनाओं के चलते सिम्बा खुद पर अविश्वास करता है लेकिन बाद में अपने हिस्से का संघर्ष कर राजा बनता है. सिम्बा का राज्य अफ्रीका के किसी जंगल में है. प्राइड नाम के इस राज्य को हिंदी में गौरव भूमि नाम दिया गया है जो अपने बनावटीपन के चलते पूरी फिल्म के दौरान खटकता रहता है.

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द लॉयन किंग सीन दर सीन, संवाद दर संवाद अपने एनिमेटेड वर्जन का रीमेक है. यहां तक कि कई मौकों पर कैमरा एंगल तक वही रखा गया है. इसका संगीत, सारे किरदार और उनकी खूबिया-खामियां भी एक जैसी रखी गई हैं. जैसे कि सिम्बा के दोस्त पुम्बा और टिमॉन उतने ही मज़ेदार हैं और इस बार भी नहीं पता चल पाया है कि विलेन स्कार की भाषा बाकियों से अलग क्यों है.

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फिल्म के हिंदी संस्करण में मुफासा को शाहरुख खान ने और सिम्बा को उनके बेटे आर्यन खान ने आवाज दी है. दोनों ही प्रभावित करने वाले हैं. कई बार तो आर्यन खान की आवाज शाहरुख की आवाज होने का भ्रम करवा देती है. लेकिन आर्यन शब्दों को जल्दी-जल्दी बोलते हैं, इसलिए फर्क किया जा सकता है. सिम्बा के साथियों पुम्बा और टिमॉन की आवाजें संजय मिश्रा और श्रेयस तलपड़े ने दी है. संजय मिश्रा अपने बंबइया उच्चारण से ढेर सारा मनोरंजन पैदा करते हैं और तलपड़े इसमें उनका बखूबी साथ निभाते हैं.

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जॉन फेवरू निर्देशित द लॉयन किंग एक शानदार विजुअल ट्रीट है. इसमें जंगल, नदियां, तितलियां, पंछी सबसे इतने जानदार रचे गए हैं कि लगता है कि हाथ बढ़ाकर इन्हें छुआ जा सकता है. संवादों की बात करें तो बुरे ट्रांसलेशन के चलते कई जगहों पर इनमें भावनाओं की नमी जरा कम पता चलती है. लेकिन इसके बाद भी फिल्म आपको ढेर सारा मनोरंजन देगी. और हां बाहर निकल कर यह जरूर सोचिएगा कि अगर ये जंगल और जानवर खत्म हो गए, तो हम क्या खो देंगे!

  • मोहन भागवत

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