द फकीर ऑफ वेनिस - अन्नू कपूर, फरहान अख्तर

मनोरंजन | फिल्म समीक्षा

द फकीर ऑफ वेनिस: उम्दा कहानी, साधारण पटकथा, कमजोर निर्देशन और अन्नू कपूर

कलाकार: फरहान अख्तर, अन्नू कपूर, कमल सिद्धू, झिलमिल हजारिका, वेलेंटीना कार्नेलुटी | निर्देशक: आनंद सुरापुर | लेखक: होमी अदजानिया, राजेश देवराज | रेटिंग: 2/5

ब्यूरो | 09 फरवरी 2019

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इस हफ्ते रिलीज हुई ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ में फरहान अख्तर के पात्र का नाम आदि कॉन्ट्रेक्टर है. यह नायक एक प्रोडक्शन कंट्रोलर का काम करता है और फिल्में शूट करने वाले क्रू को उनकी जरूरत की चीजें हर कीमत पर मुहैया कराता है. एक दिन उसे पता चलता है कि वेनिस की एक आर्ट गैलरी के मालिक को मिट्टी के अंदर सर दबाकर, लंबे समय तक सांस रोक सकने वाला एक हिंदुस्तानी फकीर चाहिए. यूरो में मिलने वाली कीमत के लालच में हमारा हीरो यह बेईमानी वाला काम अपने हाथ में ले लेता है.

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इसके बाद अन्नू कपूर रूपी नकली फकीर को लेकर हीरो वेनिस पहुंचता है. लेकिन यहां आकर एक दिलचस्प कहानी एक मजबूत पटकथा में तब्दील नहीं हो पाती है. साफ तौर पर फिल्म की पटकथा लेयर्ड नहीं है, यानी कि परतदार, और इंटरवल के बाद साधारण लिखाई की मारी है. सिर्फ अन्नू कपूर के फरहान अख्तर और इतालवी अभिनेत्री वेलेंटीना के साथ वाले कुछ सुंदर दृश्य ही हैं, जो हमारे दिल में सीधे उतर पाते हैं.

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विज्ञापन फिल्मों की दुनिया से आए निर्देशक आनंद सुरापुर का निर्देशन भी अपनी अनुभवहीनता की छाप ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ के कई दृश्यों और नरेटिव पर छोड़ता है. फिल्ममेकिंग की नैचुरलिस्टिक स्टाइल अपनाने के बावजूद इसमें यथार्थवाद की कमी साफ नजर आती है. अपने कच्चेपन के चलते यह फिल्म न तो आध्यात्म की दुनिया के ढोंग को ठीक से हमारे सामने रखती है और न ही अपने ज्यादातर किरदार को ही हमसे जोड़ पाती है.

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अभिनय की पड़ताल करें तो ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ में फरहान अख्तर का अभिनय उतना टिमटिमाने वाला नहीं है. लेकिन यह बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म थी. और इस हिसाब से उनका काम आंखों को अखरता नहीं है.

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लेकिन इस पुरानी फिल्म को अगर आप देखना ही चाहें तो अन्नू कपूर के लिए देखिएगा. कम संवादों वाले गरीब फकीर सत्तार के रोल में वे अपने दुखी और उदास चेहरे से आपका दिल जीत लेंगे. उन्हें देखकर एक बार फिर आपका यह यकीन पुख्ता हो जाएगा, कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को इस कद्दावर अभिनेता का सही उपयोग करना आता ही नहीं है.

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