केसरी में अक्षय कुमार

मनोरंजन | सिनेमा

केसरी : एक वॉर फिल्म जो इतिहास और सिनेमा दोनों से दूरी बनाकर रखती है

निर्देशक: अनुराग सिंह | लेखक: अनुराग सिंह, गिरीश कोहली | कलाकार: अक्षय कुमार, परिणीति चोपड़ा, राकेश चतुर्वेदी, वंश भारद्वाज, प्रीतपल पाली | रेटिंग: 2/5

ब्यूरो | 23 मार्च 2019

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‘केसरी’ को दो कसौटियों पर खरा उतरना था. एक तो सारागढ़ी युद्ध से जुड़े इतिहास को सही तरीके से प्रस्तुत करना था. दूसरा देशभक्ति का आधुनिक चेहरा बन चुके अक्षय कुमार से रहने वाली उम्मीदों को सही साबित करते हुए एक मनोरंजक वॉर-फिल्म होना था. केसरी रंग की पगड़ी को अपनी पंजाबी सुपरहीरो फिल्म ‘सुपर सिंह’ में भी इस्तेमाल करने वाले अनुराग सिंह की ‘केसरी’ इन दोनों ही कसौटियों पर एक औसत फिल्म साबित होती है.

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बैटल ऑफ सारागढ़ी 21 बहादुर सिख सैनिकों द्वारा दस हजार अफगानों से लड़ने की अविश्वसनीय कहानी होने के साथ, अपनी जमीन को बचाने के लिए अंग्रेजों पर हमला करने को मजबूर अफगानी कबीलों की भी कहानी है. ‘केसरी’ इस तथ्य को पूरी तरह अनदेखा कर इतिहास को उसी सहूलियत से दिखाती है जिसमें हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद, देशभक्ति और धार्मिक जज्बा सिनेमा के परदे पर हमेशा की तरह निखर कर सामने आए और मुस्लिम चरित्रों को स्टीरियोटाइप्ड खलनायकों की तरह आसानी से दिखाया जा सके.

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कल्पना की भरपूर टेक लेकर फैक्ट कम और फिक्शन ज्यादा रचने के कायल बॉलीवुड के स्तर से भी तौलें तो ‘केसरी’ निराश करती है. 150 मिनट की इस बेहद लंबी फिल्म में आखिरी के 20-30 मिनट ही दर्शनीय है, जब घोर एक्शन और अक्षय कुमार फिल्म से आपको जोड़ते हैं. वर्ना बाकी के वक्त तो फिल्म बस मशहूर सारागढ़ी युद्ध तक पहुंचने के लिए बिल्ड-अप ही लेती है.

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इसके बावजूद ईशर सिंह के अलावा बाकी कोई सैनिक आप पर छाप नहीं छोड़ पाता और लंबी-चौड़ी बैक-स्टोरी भी केवल अक्षय कुमार को दी जाती है. कुछ छोटे-मोटे इंट्रोडक्शन देकर, फालतू का मुर्गे वाला ह्यूमर ठूंसकर, बाकी पात्रों को जल्द ही बंदूक थमा दी जाती है और सिख की वेशभूषा वाला कोई भी दूसरा चरित्र शहादत देने के बावजूद आपके लिए मायने नहीं रख पाता.

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‘केसरी’ अगर आखिर तक देखते चलने लायक बनी रहती है, तो बढ़िया पंजाबी बोलने और शिद्दत से ईशर सिंह बनने वाले अक्षय कुमार की जबरदस्त स्क्रीन प्रेजेंस ही इसकी इकलौती वजह है. बाकी न ये बेहतर सिनेमा है, न इतिहास की बेहतर समझ रखता है.

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