भारतीय पुलिस

आंकड़न | पुलिस

पुलिस हिरासत में होने वाली 63 फीसदी मौतें 24 घंटे के भीतर ही हो जाती हैं

बीते एक दशक में पुलिस हिरासत में मौत के 1000 से ज्यादा मामले दर्ज किये गए जिनमें से आधे सिर्फ तीन राज्यों के हैं

ब्यूरो | 25 नवंबर 2020 | फोटो: ट्विटर-मुंबई पुलिस

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पुलिस हिरासत में मौत का मामला देश में काफी समय से बहस का सबब रहा है. यह अलग बात है कि इस दिशा में जमीन पर कुछ खास होता नहीं दिख रहा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के मुताबिक इस साल 12 अक्टूबर तक देश में पुलिस हिरासत के दौरान मौत की 67 घटनाएं हो चुकी हैं. बीते 10 सालों का रिकॉर्ड देखें तो यह आंकड़ा एक हजार से ऊपर जाता है. महाराष्ट्र इस मामले में सबसे आगे है जिसकी इस आंकड़े में करीब 21.5 फीसदी हिस्सेदारी है. इसके बाद आंध्र प्रदेश (13 फीसदी) और गुजरात (11 फीसदी) का नंबर आता है. इस तरह देखें तो बीते एक दशक के दौरान पुलिस हिरासत में मौत की करीब आधी घटनाएं (45.5 फीसदी) इन तीनों राज्यों में हुई हैं.

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जिन पांच राज्यों में पुलिस हिरासत के दौरान मौत की सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज हुई हैं उनमें महाराष्ट्र के अलावा उत्तर प्रदेश भी शामिल है. इन दोनों राज्यों में बीते दशक के दूसरे हिस्से में ऐसी घटनाओं में काफी कमी दर्ज की गई है. आंकड़ों में समझें तो महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में बीते 10 साल में हिरासत में मौत के कुल 298 मामले दर्ज किए गए.  इनमें से 209 यानी करीब 70 फीसदी पहले पांच सालों में दर्ज हुए. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्टों की मानें तो उत्तर प्रदेश में 2018 और 2019 के दौरान पुलिस हिरासत में कोई मौत नहीं हुई. हालांकि मीडिया में आई खबरें बताती हैं कि इस दौरान प्रदेश में कम से कम 10 लोग पुलिस हिरासत में मारे गए. इनमें कन्नौज के रविंद्र कुमार का मामला भी शामिल है जिसे लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को नोटिस भी भेजा था.

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एनसीआरबी के मुताबिक देश में 18 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां बीते एक दशक के दौरान पुलिस हिरासत में मौत के 10 या इससे भी कम मामले दर्ज किए गए. अंडमान और निकोबार में ऐसा सिर्फ एक मामला दर्ज हुआ. सिक्किम, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव और लक्षद्वीप में तो ऐसा एक भी मामला देखने में नहीं आया. ये सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भारत में सबसे कम आबादी वाले इलाकों में शुमार हैं. हालांकि ज्यादा आबादी वाले भी कुछ इलाके हैं जहां बीते दशक के दौरान पुलिस हिरासत में अपेक्षाकृत कम मौतें दर्ज हुईं. मसलन आबादी के लिहाज से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शहर और भारत की राजधानी दिल्ली में इस दौरान ऐसे चार मामले ही देखने में आए. यह आंकड़ा गोवा, मेघालय और नागालैंड से भी कम था जहां पुलिस हिरासत में पांच मौतें दर्ज हुईं. आबादी के लिहाज से देश के तीसरे सबसे बड़े राज्य बिहार के लिए यह आंकड़ा 10 रहा.

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आंकड़े बताते हैं कि बीते एक दशक के दौरान पुलिस हिरासत में हुई मौतों के मामलों में 63 फीसदी ऐसे थे जहां आरोपित की मौत गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर ही हो गई. कानून कहता है कि पुलिस को किसी भी आरोपित की गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर उसे स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा. लेकिन बीते एक दशक के दौरान 633 आरोपितों की मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से पहले ही मौत हो गई. गुजरात, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब और महाराष्ट्र में बीते एक दशक के दौरान पुलिस हिरासत में मौत के ऐसे तीन चौथाई से भी ज्यादा मामले हैं. गुजरात में तो ऐसे मामलों का आंकड़ा 87 फीसदी तक जाता है. उधर, तमिलनाडु ने इस लिहाज से एक नया शर्मनाक रिकॉर्ड बनाया है. वहां 2014 से 2019 के दौरान पुलिस हिरासत में 46 मौतें हुईं और इनमें से 44 (96 फीसदी) ऐसे मामले थे जहां मौत गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर ही हो गई.

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सारे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने-अपने यहां होने वाले अपराधों का डेटा एनसीआरबी को देते हैं जो उनके आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करता है. लेकिन कई बार राज्यों की तरफ से इस काम में ढिलाई भी हो जाती है. मसलन पश्चिम बंगाल ने 2019 के लिए अपना डेटा समय पर जमा नहीं किया. इसके चलते एनसीआरबी ने इस साल की अपनी रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के लिए 2018 का आंकड़ा ही दोहरा दिया. अलग-अलग स्रोतों के आंकड़ों में अंतर भी दिखता है. मसलन पुलिस हिरासत में मौतों को लेकर मानवाधिकार आयोग और एनसीआरबी के आंकड़े कई बार मेल नहीं खाते.  2019 में एनसीआरबी ने पुलिस हिरासत में मौत के 85 मामले दर्ज किए, जबकि मानवाधिकार आयोग के लिए यह आंकड़ा 117 रहा. यानी 38 फीसदी ज्यादा. उधर, सिविल सोसायटी से जुड़े संगठनों की मानें तो 2019 के दौरान देश में पुलिस हिरासत में मौत की 124 घटनाएं हुईं.

(इंडियास्पेंड की इस रिपोर्ट पर आधारित)

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