कोरोना संकट

आंकड़न | कोविड-19

कोरोना संकट का सही हाल जानने के लिए सरकारी आंकड़े नहीं बल्कि कहीं और देखने की जरूरत है

कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने भारत में हालात भयावह कर दिए हैं. लेकिन इस भयावहता का सही अंदाजा सरकारी आंकड़ों से नहीं लगाया जा सकता

ब्यूरो | 10 मई 2021 | फोटो: स्क्रीनशॉट

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नौ मई को एक बार फिर भारत में कोरोना वायरस के चार लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए जबकि मौतों की संख्या चार हजार से ऊपर रही. कहने की जरूरत नहीं कि हालात भयावह हैं. लेकिन सच यह है कि ये आंकड़े भी इस भयावहता को बहुत कम करके बता रहे हैं. जैसा कि अपने एक ट्वीट में अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी से जुड़े स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के डीन डॉक्टर आशीष के झा कहते हैं, ‘वास्तव में मौतों की संख्या करीब 25 हजार प्रति दिन होगी जबकि संक्रमण के मामलों का आंकड़ा 20 से 50 लाख तक होगा.’ महामारियों के मामले में दुनिया के सबसे बड़े विशेषज्ञों में से एक डॉ झा के मुताबिक यह जानने के कई तरीके हैं, लेकिन सबसे सीधा यही है कि श्मशान घाटों पर एक नजर डाल ली जाए.

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डॉ आशीष के झा हार्वर्ड विश्वविध्यालय के ग्लोबल हैल्थ इंस्टीट्यूट के निदेशक भी रह चुके हैं. उनके मुताबिक साल 2019 में, जब भारत में कोरोना वायरस नहीं आया था, तो देश में हर दिन मरने वालों का औसत आंकड़ा 27 हजार था. वे लिखते हैं, ‘इतनी मौतें श्मशान घाट रोज हैंडल करते हैं. इस आंकड़े में चार हजार की बढ़ोतरी हो जाए तो भी वहां अव्यवस्था नहीं होगी. (लेकिन) देश भर के श्मशानों से आम दिनों की अपेक्षा दो से चार गुना ज्यादा शव आने की खबरें आ रही हैं.’ कुछ दिन पहले एक परिचर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त का भी कहना था, ‘जिस शाम मैंने गाजियाबाद में हिंडन किनारे स्थित एक श्मशान घाट पर सिर्फ एक घंटे के दौरान 20 शव देखे, उस पूरे दिन के लिए जिला प्रशासन की तरफ से कुल मौतों की आधिकारिक संख्या आठ बताई गई थी.’

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इसलिए सबसे ठीक-ठीक आकलन में भी माना जा सकता है कि भारत में इन दिनों रोज करीब 55 से 80 हजार लोग मर रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो सामान्य हालात की तुलना में लगभग 25 से 50 हजार अतिरिक्त मौतें हो रही हैं. यानी करीब चार हजार मौतों का जो आंकड़ा आधिकारिक स्रोत बता रहे हैं वह बिल्कुल भी सही नहीं है. सीएनएन से बातचीत में नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकॉनॉमिक्स एंड पॉलिसी के निदेशक आर लक्ष्मीनारायण कहते हैं, ‘मैं जिस किसी भी परिवार के बारे में सोचता हूं उसमें किसी न किसी की (कोरोना से) मौत हुई है.’

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अब संक्रमण के मामलों की बात. भारत में इंफेक्शन फैटैलिटी रेश्यो (आईएफआर) एक फीसदी है. यानी 100 लोगों को संक्रमण होता है तो उनमें से एक के लिए वह घातक साबित होता है. डॉ आशीष के झा लिखते हैं, ‘आप कह सकते हैं कि ये ज्यादा है क्योंकि अमेरिका में यही आंकड़ा 0.6 फीसदी है और भारत की आबादी अपेक्षाकृत युवा है. लेकिन भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था ढह चुकी है. लोग ऑक्सीजन की कमी से मर रहे हैं तो एक फीसदी का आईएफआर ठीक-ठाक ही है. इसे बहुत कम भी कहा जा सकता है.’ डॉ. झा के मुताबिक इस आईएफआर के हिसाब से देखें तो भारत में रोज 25 से 50 लाख लोगों को कोरोना वायरस का संक्रमण हो रहा होगा.

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तो आखिर में बात यह है कि भारत में कोरोना वायरस से रोज करीब चार हजार नहीं बल्कि कहीं ज्यादा मौतें हो रही हैं. और जो आंकड़ा भारत में कुल कोरोना संक्रमण का बताया जा रहा है वह सही नहीं है और उतने लोग सिर्फ एक ही दिन में कोरोना वायरस से संक्रमित हो रहे हैं. अगर सरकार के आंकड़े सही होते तो श्मशानों से ऐसी तस्वीरें नहीं आ रही होतीं. लेकिन जिस तरह से उनमें 24 घंटे (हिंदू धर्म में सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार की परंपरा नहीं है) चिताएं चल रही हैं और लकड़ियां कम पड़ गई हैं उसे देखते कह सकते हैं कि कोरोना वायरस रोज कम से कम 25 हजार लोगों की तो जान ले ही रहा है. डॉ आशीष के झा लिखते हैं, ‘आप किसी बीमारी को नजरअंदाज कर दीजिए, टेस्ट मत करिये या फिर आंकड़े कम करके बताइए, लेकिन भारत में आप लाशों से नजर नहीं फेर सकते. लाशें बता रही हैं कि ये महामारी उससे कहीं ज्यादा भयावह है जितनी आधिकारिक आंकड़े बता रहे हैं और हमें यह सच सुनना ही होगा.’

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